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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/6/2

35 Sukta
4 Mantra
1/6/2
Devata- अपांनपात् सोम आपश्च देवताः Rishi- सिन्धुद्वीपं कृतिः, अथवा अथर्वा Chhanda- गायत्री Suktam- जल चिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
अ॒प्सु मे॒ सोमो॑ अब्रवीद॒न्तर्विश्वा॑नि भेष॒जा। अ॒ग्निं च॑ वि॒श्वशं॑भुवम् ॥

अ॒प्ऽसु । मे॒ । सोम॑: । अ॒ब्र॒वी॒त् । अ॒न्त: । विश्वा॑नि । भे॒ष॒जा । अ॒ग्निम् । च॒ । वि॒श्वऽशं॑भुवम् ॥

Mantra without Swara
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा। अग्निं च विश्वशंभुवम् ॥

अप्ऽसु । मे । सोम: । अब्रवीत् । अन्त: । विश्वानि । भेषजा । अग्निम् । च । विश्वऽशंभुवम् ॥

Meaning
१. (सोमः) = उस सोम परमात्मा ने (मे) = मेरे लिए (अब्रवीत्) = यह उपदेश किया है कि (अप्सु अन्त:) = जलों में (विश्वानि भेषजा) = सब औषध हैं। जल सब रोगों का प्रतीकार करनेवाले हैं। एक जल-चिकित्सक जल के विविध प्रयोगों से शरीर को नीरोग करता है। जल का 'भेषजम्' यह नाम ही पड़ गया है। यह सचमुच औषध है। जल के विषय में निम्न नियमों का पालन शरीर को स्वस्थ रखता है-[क] उष:काल में अधिक-से-अधिक जल पीने का प्रयत्न करना, [ख] भोजन के आरम्भ व अन्त में जल न लेकर बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा करके लेना, [ग] पीने के लिए गरम पानी का प्रयोग करना, गर्मियों में भी बर्फ का प्रयोग न करना, [घ] स्नान के लिए ठण्डे पानी का ही प्रयोग करना, स्नान स्पञ्जिङ्ग रूप में करना। २. उसी सोम प्रभ ने च-यह भी बताया कि (अग्निं विश्वशंभुवम्) = अग्नि सब शान्तियों को उत्पन्न करनेवाला है। गरम पानी में अग्नि व जल का मेल हो जाता है और ये दोनों मिलकर रोगों को शान्त करनेवाले होते हैं। शरीर में गरमी होती है, अत: वहाँ ठण्डा पानी भेजना ठीक नहीं। बाहर से शरीर ठण्डा है, वहाँ ठण्डे पानी का प्रयोग ही ठीक है।
Essence
जल में सब औषध है। अग्नि व जल दोनों मिलकर शान्ति देनेवाले हैं।
Subject
जल+अग्नि

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