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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/5/4

35 Sukta
4 Mantra
1/5/4
Devata- अपांनपात् सोम आपश्च देवताः Rishi- सिन्धुद्वीपम् Chhanda- वर्धमान गायत्री Suktam- जल चिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
ईशा॑ना॒ वार्या॑णां॒ क्षय॑न्तीश्चर्षणी॒नाम्। अ॒पो या॑चामि भेष॒जम् ॥

ईशा॑ना: । वार्या॑णाम् । क्षय॑न्ती: । च॒र्ष॒णी॒नाम् । अ॒प: । या॒चा॒मि॒ । भे॒ष॒जम् ॥

Mantra without Swara
ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्। अपो याचामि भेषजम् ॥

ईशाना: । वार्याणाम् । क्षयन्ती: । चर्षणीनाम् । अप: । याचामि । भेषजम् ॥

Meaning
१. मैं (अप:) = जलों से (भेषजं याचामि) = औषध माँगता हूँ-इन जलों में सब औषधगुण तो हैं ही। इन जलों से मैं उस औषध को माँगता हूँ जोकि (वार्याणाम्) = सब वरणीय गुणों व तत्त्वों के (ईशाना:) = ईशान हैं। इनमें कौन-सी वरणीय वस्तु नहीं है? वस्तुत: इसी कारण से ये (चर्षणीनाम्) = मनुष्य के (क्षयन्ती:) = उत्तम निवास का कारण है [क्षि निवासे]। शरीर के लिए सब वरणीय वस्तुओं को प्राप्त कराके ये जल हमारे निवास को उत्तम बनाते हैं।
Essence
सब वरणीय तत्त्वों के ईशानभूत ये जल हमारे लिए औषध हैं। ये हमारे सब रोगों का निवारण करके हमारे निवास को उत्तम बनाते हैं।
Subject
वार्यों का ईशान
Special
इस सूक्त के आरम्भ में जलों को कल्याणकारक कहा है [१]। इनमें प्रभु ने अत्यन्त कल्याणकारक रस की स्थापना की है [२]। ये उस रस के द्वारा हमें जनन-शक्ति से युक्त करते हैं [३] और सब वरणीय वस्तुओं के ईशान होते हुए ये जल सब रोगों के औषध बनकर हमारे निवास को उत्तम बनाते हैं [४]। ये शान्ति देनेवाले तथा रोगों पर आक्रमण करके हमारी रक्षा करनेवाले हैं -

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