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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/4/3

35 Sukta
4 Mantra
1/4/3
Devata- अपांनपात् सोम आपश्च देवताः Rishi- सिन्धुद्वीपम् Chhanda- गायत्री Suktam- जल चिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
अ॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये॒ यत्र॒ गावः॒ पिब॑न्ति नः। सिन्धु॑भ्यः॒ कर्त्वं॑ ह॒विः ॥

अ॒पः । दे॒वीः । उप॑ । ह्व॒ये॒ । यत्र॑ । गाव॑: । पिब॑न्ति । नः॒ । सिन्धु॑ऽभ्यः । कर्त्व॑म् । ह॒विः ॥

Mantra without Swara
अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥

अपः । देवीः । उप । ह्वये । यत्र । गाव: । पिबन्ति । नः । सिन्धुऽभ्यः । कर्त्वम् । हविः ॥

Meaning
१. मैं (देवी: अप:) = दिव्य गुणोंवाले जल को  (उपह्व्ये) = पुकारता हूँ-इन दिव्य गुणोंवाले जलों की प्राप्त के लिए प्रार्थना करता हूँ। (न:) = हमारी (गाव:) = गौएँ (यत्र) = यहाँ (पिबन्ति) = शुद्ध जल का पान करती हैं। शुद्ध जलों को पीकर ही तो वे दिव्य गुणयुक्त दूध देनेवाली होंगी। पेय-जल के गुण ही तो उनके दूध में आएँगे। २. इसके अतिरिक्त (सिन्धुभ्यः) = नदियों के द्वारा (हविः कर्वम्) = हव्य पदार्थों को उत्पन्न करने के लिए इन जलों की आराधना करता हूँ। दिव्य गुणवाले जलों से अन्न भी उत्तम उत्पन्न होता है। वृष्टिजल से उत्पन्न अन्न इसीलिए सर्वोत्तम होता है।
Essence
दिव्य गुणयुक्त जलों के पान से गौओं का दूध भी उत्तम होता है और इस जल से उत्पन्न अन्न भी सात्त्विक होता है।
Subject
उत्तम दूध, उत्तम अन्न

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