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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/4/2

35 Sukta
4 Mantra
1/4/2
Devata- अपांनपात् सोम आपश्च देवताः Rishi- सिन्धुद्वीपम् Chhanda- गायत्री Suktam- जल चिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
अ॒मूर्या उप॒ सूर्ये॒ याभि॑र्वा॒ सूर्यः॑ स॒ह। ता नो॑ हिन्वन्त्वध्व॒रम् ॥

अ॒मूः । याः । उप॑ । सूर्ये॑ । याभि॑: । वा॒ । सूर्य॑: । स॒ह । ताः । नः॒ । हि॒न्व॒न्तु॒ । अ॒ध्व॒रम् ॥

Mantra without Swara
अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह। ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥

अमूः । याः । उप । सूर्ये । याभि: । वा । सूर्य: । सह । ताः । नः । हिन्वन्तु । अध्वरम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र की नदियों के जल का सङ्केत करते हुए कहते हैं कि (अमू:) = वे (या:) = जो जल(उप सूर्ये) = सूर्य के समीप हैं, (वा) = अथवा (सूर्यः याभिः सह) = सूर्य जिनके साथ है, (ता:) = वे जल (न:) = हमारे (अध्वरम्) = यज्ञ को-यज्ञ के भाव को (हिन्वन्तु) = बढ़ाते [Promote further] हैं। २. सूर्य के सम्पर्क में स्थित जलों के इस गुण का कितना महत्त्व है कि वे प्रयुक्त होने पर हमारी यज्ञिय भावना की वृद्धि करते हैं। वे जल जो सदा अन्धकारवाले प्रदेश में होते हैं उनमें शरीर व मन को निर्दोष बनाने के गुणों में भी कमी आ जाती है। नदियों के जल का सदा यही महत्त्व है कि वे सदा सूर्य-किरणों के सम्पर्क में है, इससे उस जल के रोग-कृमियों का नाश हो जाता है और उनमें प्राणदायी तत्त्व की स्थापना हो जाती है।
Essence
जल वही ठीक है जो सूर्य के सम्पर्क में है।
Subject
सुर्य-किरणों के सम्पर्कवाला