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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/35/3

35 Sukta
4 Mantra
1/35/3
Devata- हिरण्यम्, इन्द्राग्नी, विश्वे देवाः Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
अ॒पां तेजो॒ ज्योति॒रोजो॒ बलं॑ च॒ वन॒स्पती॑नामु॒त वी॒र्या॑णि। इन्द्र॑ इवेन्द्रि॒याण्यधि॑ धारयामो अ॒स्मिन्तद्दक्ष॑माणो बिभर॒द्धिर॑ण्यम् ॥

अ॒पाम् । तेज॑: । ज्योति॑: । ओज॑: । बल॑म् । च॒ । वन॒स्पती॑नाम् । उ॒त । वी॒र्याणि । इन्द्रे॑ऽइव । इ॒न्द्रि॒याणि॑ । अधि॑ । धा॒र॒या॒म॒: । अ॒स्मिन् । तत् । दक्ष॑माण: । बि॒भ॒र॒त् । हिर॑ण्यम् ॥

Mantra without Swara
अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामुत वीर्याणि। इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन्तद्दक्षमाणो बिभरद्धिरण्यम् ॥

अपाम् । तेज: । ज्योति: । ओज: । बलम् । च । वनस्पतीनाम् । उत । वीर्याणि । इन्द्रेऽइव । इन्द्रियाणि । अधि । धारयाम: । अस्मिन् । तत् । दक्षमाण: । बिभरत् । हिरण्यम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र में वर्णित हिरण्य क्या है? इसका उत्तर देते हुए करते हैं-यह (अपाम) = जलों का (तेज:) = तेज है, यह (ज्योतिः) = जलों की ज्योति है, (ओजः बलं च) = यह जलों का ओज व बल है। जलों से उत्पन्न हुआ यह तेज अन्नमयकोश को तेजस्वी बनाता है, विज्ञानमयकोश को ज्योतिर्मय और मनोमय कोश को ओजस्वी व बलवान् बनाता है। २. (उत) = और यह हिरण्य (वनस्पतीनां वीर्याणि) = वनस्पतियों के वीर्य हैं। यह हिरण्य क्या है? वानस्पतिक पदार्थों के सेवन से शरीर में उत्पन्न हुई यह प्राणमयकोश को वीर्यवान बनाती है। ३. इस हिरण्य के शरीर में रक्षण के लिए हम (इन्द्रः इव) = एक जितेन्द्रिय पुरुष की भांति (इन्द्रियाणि) = इन्द्रियों को (अधिधारयामः) = आधिक्येन धारण करते हैं-इन्द्रियों को अपने वश में करते हैं। इन्द्रियों को वश में करने से ही इनका रक्षण हो सकता है। ४. इसप्रकार इन्द्रियों को वश में करनेवाला (दक्षमाण:) = सब प्रकार की उन्नति चाहनेवाला पुरुष (अस्मिन्) = इस शरीर में (तत्) = उस (हिरण्यम्)  = हितरमणीय वीर्य को (बिभरत्) = धारण करता है।
Essence
शरीर में धारण किया गया जलों व वनस्पतियों से उत्पन्न 'हिरण्य' अन्नमयकोश को तेजस्वी बनाता है, प्राणमयकोश को वीर्यसम्पन्न, मनोमयकोश को ओजस्वी व बलवान् तथा विज्ञानमयकोश को ज्योतिर्मय।
Subject
जलों व वनस्पतियों का सेवन