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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 1/34/5

35 Sukta
5 Mantra
1/34/5
Devata- मधुवनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- मधु विद्या
Mantra with Swara
परि॑ त्वा परित॒त्नुने॒क्षुणा॑गा॒मवि॑द्विषे। यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥

परि॑ । त्वा॒ । प॒रि॒ऽत॒त्नुना॑ । इ॒क्षुणा॑ । अ॒गा॒म् । अवि॑ऽद्विषे । यथा॑ । माम् । का॒मिनी॑ । अस॑: । यथा॑ । मत् । न । अप॑ऽगाँ: । अस॑: ॥

Mantra without Swara
परि त्वा परितत्नुनेक्षुणागामविद्विषे। यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः ॥

परि । त्वा । परिऽतत्नुना । इक्षुणा । अगाम् । अविऽद्विषे । यथा । माम् । कामिनी । अस: । यथा । मत् । न । अपऽगाँ: । अस: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. पति पत्नी से कहता है कि (त्वा) = तुझे (परितनुना ) = चारों ओर फैलनेवाले (इक्षणा) = इस इक्षुदण्ड के साथ (अविद्विषे) = सब प्रकार की अनीति को दूर करने के लिए (परि आगाम्) = सब ओर से प्राप्त हुआ हूँ, (यथा) = जिससे तू भी (मां कामिनी) = मुझे चाहनेवाली, मुझसे प्रीति करनेवाली (असः) = हो, (यथा) = जिससे (मत्) = मुझसे (अपगा:) = दूर जानेवाली तु (न अस:) = न हो। २. इक्षुदण्ड को लेकर आने का भाव इतना ही है कि इक्षुदण्ड से माधुर्य की प्रेरणा लेकर आना। जब पति पत्नी के साथ सदा मधुर व्यवहार करने का व्रत लेकर उपस्थित होता है तभी वह पत्नी से भी यह आशा करता है कि वह उसी के प्रति प्रेमवाली होगी और कभी उससे दूर होने का ध्यान न करेगी। ३. यह पंक्ति राजा व राष्ट्रसभा के लिए भी विनियुक्त हो सकती है। इसीप्रकार आचार्य व छात्र के लिए भी।
Essence
पति का मधुर व्यवहार पत्नी को उसके प्रति प्रेमवाला बनाए।
Subject
माधुर्य का प्रेरक इक्षुदण्ड
Special
सूक्त की भावना एक पंक्ति में यही है कि हम मधुर-ही-मधुर बनें। ऐसा बनने के लिए आवश्यक है कि हम अपने में शक्ति धारण करें। शक्ति का हास ही हमें खिझने की वृत्तिवाला बनाता है, अत: अथर्वा की कामना है -