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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/33/2

35 Sukta
4 Mantra
1/33/2
Devata- चन्द्रमाः, आपः Rishi- शन्तातिः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आपः सूक्त
Mantra with Swara
यासां॒ राजा॒ वरु॑णो॒ याति॒ मध्ये॑ सत्यानृ॒ते अ॑व॒पश्य॒ञ्जना॑नाम्। या अ॒ग्निं गर्भं॑ दधि॒रे सु॒वर्णा॒स्ता न॒ आपः॒ शं स्यो॒ना भ॑वन्तु ॥

यासा॑म् । राजा॑ । वरु॑ण: । याति॑ । मध्ये॑ । स॒त्या॒नृ॒ते इति॑ स॒त्य॒ऽअ॒नृ॒ते । अ॒व॒ऽपश्य॑न् । जना॑नाम् । या: । अ॒ग्निम् । गर्भ॑म् । द॒धि॒रे । सु॒ऽवर्णा॑: । ता: । न॒: । आप॑: । शम् । स्यो॒ना: । भ॒व॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम्। या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु ॥

यासाम् । राजा । वरुण: । याति । मध्ये । सत्यानृते इति सत्यऽअनृते । अवऽपश्यन् । जनानाम् । या: । अग्निम् । गर्भम् । दधिरे । सुऽवर्णा: । ता: । न: । आप: । शम् । स्योना: । भवन्तु ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. जलों का अधिष्ठातृदेव 'वरुण' कहलाता है। यह अशुभ का निवारण करनेवाला है। यह शरीर से रोगों को दूर करता है तो मन से अनृत को हटाता है। ये (वरुण:) = वरुण (जनानां मध्ये याति) = मनुष्यों के मध्य में विचरते हैं-विद्यमान हैं, (सत्यानुते अवपश्यन्) = उनके सत्य व अनृतों को देख रहे हैं। इसप्रकार ये हमें अनृत से पृथक् करते हैं और सत्य से संयुक्त करते हैं। ये वरुण (यासां राजा) = जिन जलों के अधिष्ठातदेव हैं और (या:) = जो जल (अनि गर्भ दधिरे) = अनि को अपने मध्य में धारण करते हैं, (सुवर्णा:) = उत्तम वर्णवाले हैं (ताः आप:) = वे जल (न:) = हमारे लिए (शम्) = शान्ति देनेवाले व (स्योना:) = सुखकर (भवन्तु) = हों। २. जलों के अधिष्ठातृदेव को वरुण कहा गया है। वरुण 'निवारक' हैं-दोषों का निवारण करके हमें श्रेष्ठ बनानेवाले हैं। जल भी हमारे रोगों का निवारण करके हमें स्वास्थ्य प्रदान करते हैं और क्रोधादि को दूर करके शान्तिलाभ कराते हैं। सामान्यतः उस पानी का पीने में प्रयोग अधिक हितकर है जिसे उबाल लिया गया है, जिसे अग्रिगर्भ बना लिया गया है।
Essence
जलों का राजा 'वरुण' है-दोषों का निवारक, अत: ये जल दोषों के निवारक क्यों न हों?
Subject
'वरुण' के जल