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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/32/4

35 Sukta
4 Mantra
1/32/4
Devata- द्यावापृथिवी Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- महद्ब्रह्मा सूक्त
Mantra with Swara
विश्व॑म॒न्याम॑भी॒वार॒ तद॒न्यस्या॒मधि॑ श्रि॒तम्। दि॒वे च॑ वि॒श्ववे॑दसे पृथि॒व्यै चा॑करं॒ नमः॑ ॥

विश्व॑म । अ॒न्याम् । अ॒भि॒ऽवार॑ । तत् । अ॒न्यस्या॑म् । अधि॑ । श्रि॒तम् । दि॒वे । च॒ । वि॒श्वऽवे॑दसे । पृ॒थि॒व्यै । च॒ । अ॒क॒र॒म् । नम॑: ॥

Mantra without Swara
विश्वमन्यामभीवार तदन्यस्यामधि श्रितम्। दिवे च विश्ववेदसे पृथिव्यै चाकरं नमः ॥

विश्वम । अन्याम् । अभिऽवार । तत् । अन्यस्याम् । अधि । श्रितम् । दिवे । च । विश्वऽवेदसे । पृथिव्यै । च । अकरम् । नम: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (विश्वम्) = [सर्व विशति यस्मिन्] यह व्यापक आकाश (अन्याम्) = दूसरी-अपने से विलक्षण इस पृथिवी को (अभीवार) = चारों ओर से घेरे हुए है। वस्तुत: आकाश के एक देश में ही पृथिवी स्थित है, परन्तु (तत्) = वह आकाश (अन्यस्याम्) = अपने से भिन्न इस पृथिवी में (अधिश्रितम्) = आश्रित है। पृथिवीस्थ जल ही वाष्पीभूत होकर आकाश में पहुँचता है और आकाश को वर्षण के योग्य बनाता है। २. इसप्रकार परस्पर सम्बद्ध (दिवे च पृथिव्यै) = धुलोक और पृथिवीलोक के लिए जो (विश्ववेदसे) = सब आवश्यक ओषधियों, वनस्पतियों व अन्य धनों को प्राप्त करानेवाले हैं (नमः अकरम्) = मैं आदर की भावना धारण करता हूँ। इनमें मुझे प्रभु की महिमा दीखती है और मैं नतमस्तक हो जाता हैं।
Essence
प्रभु ने द्यावापृथिवी को परस्पर सम्बद्ध बनाकर इन्हें सब ओषधियों का जन्मदाता बना दिया है। प्रभु की यह महिमा हमें उसके प्रति नतमस्तक करनेवाली है।
Subject
परस्पर सम्बद्धता
Special
विशेष-इस सूक्त में धुलोक की महिमा का वर्णन करके उस महिमा के आधारभूत प्रभु की महिमा का वर्णन हुआ है। ये धुलोक व पृथिवीलोक जिस वृष्टि की व्यवस्था करते हैं उस वृष्टि से प्राप्त जल का महत्त्वपूर्ण वर्णन अगले सूक्त में है। इन जलों से सब प्रकार की शान्ति का विस्तार करनेवाला 'शन्ताति' ही इस सूक्त का ऋषि है। यह प्रार्थना करता है -