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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/32/3

35 Sukta
4 Mantra
1/32/3
Devata- द्यावापृथिवी Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- महद्ब्रह्मा सूक्त
Mantra with Swara
यद्रोद॑सी॒ रेज॑माने॒ भूमि॑श्च नि॒रत॑क्षतम्। आ॒र्द्रं तद॒द्य स॑र्व॒दा स॑मु॒द्रस्ये॑व स्रो॒त्याः ॥

यत् । रोद॑सी॒ इति॑ । रेज॑माने॒ इति॑ । भूमि॑: । च॒ । नि॒:ऽअत॑क्षतम् । आ॒र्द्रम् । तत् । अ॒द्य । स॒र्व॒दा । स॒मु॒द्रस्य॑ऽइव । स्रो॒त्या: ॥

Mantra without Swara
यद्रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरतक्षतम्। आर्द्रं तदद्य सर्वदा समुद्रस्येव स्रोत्याः ॥

यत् । रोदसी इति । रेजमाने इति । भूमि: । च । नि:ऽअतक्षतम् । आर्द्रम् । तत् । अद्य । सर्वदा । समुद्रस्यऽइव । स्रोत्या: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (रेजमाने) = चमकते [ho shine] हुए (रोदसी) = ये द्यावापृथिवी (च भूमि:) = अथवा यह भूमि (यत्) = जिस भी (आर्द्रम्) = रस का (निरतक्षतम्) = निर्माण करते हैं (तत्) = वह रस (अद्य) = आज की भाँति (सर्वदा) = सदा ही (समद्रस्य) = समुद्र के (स्त्रोत्याः इव) = स्रोतों के समान है। जैसे समुद्र के स्त्रोत शुष्क नहीं होते, इसीप्रकार इन द्यावापृथिवी से उत्पन्न किया गया रस शुष्क नहीं हो जाता। २. प्रभु की यह भी अद्भुत ही रचना है कि द्यावापृथिवी में रस-निर्माण की शक्ति बनी ही रहती है। एक चाक्रिक क्रम से गति करती हुई यह शक्ति सदा समानरूप से बनी रहती है। पृथिवी में एक चक्र में [by rotation] विविध अन्न बोये जाते हैं और पृथिवी की उपजाऊ शक्ति में कमी नहीं आती। सनातनकाल से बरसता हुआ यह मेघ बरसता ही रहेगा। 'बरसते-बरसते थक जाएगा' ऐसी बात नहीं है।
Essence
प्रभु से द्यावापृथिवी में स्थापित की गई शक्ति सदा नवीन-सी बनी रहती है।
Subject
सदा नवीन