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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/32/2

35 Sukta
4 Mantra
1/32/2
Devata- द्यावापृथिवी Rishi- ब्रह्मा Chhanda- ककुम्मत्यनुष्टुप् Suktam- महद्ब्रह्मा सूक्त
Mantra with Swara
अ॒न्तरि॑क्ष आसां॒ स्थाम॑ श्रान्त॒सदा॑मिव। आ॒स्थान॑म॒स्य भू॒तस्य॑ वि॒दुष्टद्वे॒धसो॒ न वा॑ ॥

अ॒न्तरि॑क्षे । आ॒सा॒म् । स्याम॑ । श्रा॒न्त॒सदा॑म्ऽइव । आ॒ऽस्थान॑म् । अ॒स्य । भू॒तस्य॑ । वि॒दु: । तत् । वे॒धस॑: । न । वा॒ ॥

Mantra without Swara
अन्तरिक्ष आसां स्थाम श्रान्तसदामिव। आस्थानमस्य भूतस्य विदुष्टद्वेधसो न वा ॥

अन्तरिक्षे । आसाम् । स्याम । श्रान्तसदाम्ऽइव । आऽस्थानम् । अस्य । भूतस्य । विदु: । तत् । वेधस: । न । वा ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र में वर्णित (आसाम्) = इन वीरुधों [लताओं] का (स्थाम) = आधार (अन्तरिक्षे) = उस सबके अन्तर निवास करनेवाले [यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तर:-उप०] प्रभु में है, (इव) = उसी प्रकार जैसे (श्रान्तसदाम्) = थककर बैठनेवाले यात्रियों की वृक्षछाया आधार बनती है। २. (अस्य भूतस्य) = इस सृष्टि में वर्तमान प्रत्येक प्राणी के (तत्) = उस (आस्थानम्) = आधारभूत प्रभु को (वेधसः) = ज्ञानी भी (विदुः न वा) = जानते हैं या नहीं जानते। वस्तुत: उस प्रभु का जानना सुगम नहीं होता। वे प्रभु अचिन्त्य व अप्रमेय है, चक्षुरादि इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं है। मन से उसका मापना सुगम नहीं। इसी कारण सामान्यतया मनुष्य इन द्यावापृथिवी आदि पदार्थों को ही इन वीरुधों का आधार मान लेता है-इन्हीं से उन्हें प्राणित होता हुआ समझता है। वस्तुत: इन द्यावापृथिवी को भी प्राणित करनेवाला प्रभु ही है।
Essence
सबका आधार, सबके अन्दर स्थित वे प्रभु ही हैं। इस प्रभु का ज्ञान ज्ञानियों के लिए भी सुगम नहीं होता।
Subject
सर्वाधार