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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/31/4

35 Sukta
4 Mantra
1/31/4
Devata- आशापाला वास्तोष्पतयः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- परानुष्टुप्त्रिष्टुप् Suktam- पाशविमोचन सूक्त
Mantra with Swara
स्व॒स्ति मा॒त्र उ॒त पि॒त्रे नो॑ अस्तु स्व॒स्ति गोभ्यो॒ जग॑ते॒ पुरु॑षेभ्यः। विश्व॑म्सुभू॒तम्सु॑वि॒दत्रं॑ नो अस्तु॒ ज्योगे॒व दृ॑शेम॒ सूर्य॑म् ॥

स्व॒स्ति । मा॒त्रे । उ॒त । पि॒त्रे । न॒: । अ॒स्तु॒ । स्व॒स्ति । गोभ्य॑: । जग॑ते । पुरु॑षेभ्य: । विश्व॑म् । सु॒ऽभू॒तम् । सु॒ऽवि॒दत्र॑म् । न॒: । अ॒स्तु॒ । ज्योक् । ए॒व । दृ॒शे॒म॒ । सूर्य॑म् ॥

Mantra without Swara
स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः। विश्वम्सुभूतम्सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव दृशेम सूर्यम् ॥

स्वस्ति । मात्रे । उत । पित्रे । न: । अस्तु । स्वस्ति । गोभ्य: । जगते । पुरुषेभ्य: । विश्वम् । सुऽभूतम् । सुऽविदत्रम् । न: । अस्तु । ज्योक् । एव । दृशेम । सूर्यम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र में कहा था कि यज्ञशील व प्रभु के प्रति समर्पण करनेवाले को प्रभु उत्तम स्थिति प्राप्त कराते हैं। उसी का चित्रण करते हुए कहते हैं कि (मात्रे) = माता के लिए (उत) = और (नः पित्रे) = हमारे पिता के लिए (स्वस्ति) = कल्याण हो। घर में मङ्गल के लिए पहली बात यही है कि माता-पिता की स्थिति ठीक हो। वे नीरोग, आर्थिक चिन्ताओं से मुक्त व स्वाध्यायशील हों। ऐसा होने पर ही सन्तानों की उत्तमता सम्भव है। (गोभ्यः) = गौओं के लिए, (जगते) = गतिशील अन्य प्राणियों के लिए तथा (पुरुषेभ्यः) = घर से सम्बद्ध अन्य व्यक्तियों के लिए (स्वस्ति) = कल्याण हो। घर के साथ गौ का विशेष सम्बन्ध है। वस्तुत: यह गौ ही हमारे स्वास्थ्य को तथा यज्ञादि को सिद्ध करनेवाली होती है। यजुर्वेद का प्रारम्भ ही इन गौओं के 'अनमीव व अयक्ष्म' होने की प्रार्थना से होता है। घर के साथ सम्बद्ध अन्य व्यक्तियों का स्वास्थ्य भी घर की उत्तम स्थिति के लिए नितान्त आवश्यक है। २. इसप्रकार घर के उत्तम वातावरण में न: हमारे लिए विश्व सुभूतम्-सब उत्तम ऐश्वर्य तथा सुविदत्रम्-उत्तम ज्ञान अस्तु-हो। हम उत्तम ऐश्वर्य और ज्ञान को प्राप्त करते हुए ज्योक एव-चिरकाल तक ही सूर्यम्-सूर्य को दुशेम-देखें, अर्थात् अतिदीर्घ जीवन प्राप्त करनेवाले हों। 'ऐश्वर्य, ज्ञान व दीर्घजीवन' की प्राप्ति ही उच्चतम स्थिति है। इसी के लिए गतमन्त्र में प्रभु से प्रार्थना की गई थी।
Essence
घर में सब स्वस्थ हों। हमें वहाँ 'ऐश्वर्य, ज्ञान व दीर्घजीवन' प्राप्त हो।
Subject
सुभूत-सुविदत्रम्
Special
यह सूक्त बड़ी सुन्दरता से मुख आदि द्वारों का वर्णन करता है। चार द्वार हैं चारों द्वारों को ठीक रखनेवाला 'ब्रह्मा' इस सूक्त का ऋषि है। यह चतुर्मुख है-चारों उत्तम द्वारोंवाला है। इन द्वारों के ठीक होने पर सब 'सुभूत व सुविदा' की प्राप्ति होती है। यह ब्रह्मा ही अगले सूक्त में द्यावापृथिवी की रचना में ब्रह्म की महिमा को देखता है -