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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/31/3

35 Sukta
4 Mantra
1/31/3
Devata- आशापाला वास्तोष्पतयः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- विराडनुष्टुप Suktam- पाशविमोचन सूक्त
Mantra with Swara
अस्रा॑मस्त्वा ह॒विषा॑ यजा॒म्यश्लो॑णस्त्वा घृ॒तेन॑ जुहोमि। य आशा॑नामाशापा॒लस्तु॒रीयो॑ दे॒वः स नः॑ सुभू॒तमे॒ह व॑क्षत् ॥

अस्रा॑म: । त्वा॒ । ह॒विषा॑ । य॒जा॒मि॒ । अश्रो॑ण: । त्वा॒ । घृ॒तेन॑ । जु॒हो॒मि॒ ।य: । आशा॑नाम् । आ॒शा॒ऽपा॒ल: । तु॒रीय॑: । दे॒व: । स: । न॒: । सु॒ऽभू॒तम् । आ । इ॒ह । व॒क्ष॒त् ॥

Mantra without Swara
अस्रामस्त्वा हविषा यजाम्यश्लोणस्त्वा घृतेन जुहोमि। य आशानामाशापालस्तुरीयो देवः स नः सुभूतमेह वक्षत् ॥

अस्राम: । त्वा । हविषा । यजामि । अश्रोण: । त्वा । घृतेन । जुहोमि ।य: । आशानाम् । आशाऽपाल: । तुरीय: । देव: । स: । न: । सुऽभूतम् । आ । इह । वक्षत् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अस्त्रामः) = अश्रान्त होता हुआ (त्वा) = तुझे (हविषा) = दानपूर्वक अदन के द्वारा-यज्ञशेष के सेवन के द्वारा (यजामि) = उपासित करता हूँ। प्रभु का सच्चा पूजन यही है कि हमारा जीवन एक अविच्छिन्न यज्ञ बन जाए। ('यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:') = देव यज्ञ के द्वारा ही उस उपास्य प्रभु का पूजन करते हैं। गतमन्त्रों में वर्णित मुख द्वार का संयम यज्ञशेष के सेवन की वृत्ति से ही होता है। २. (अश्लोण:) = [श्लोण-to heap together, collect, gather] धनों का परिग्रह न करता हुआ मैं (घृतेन) = मानस नैर्मल्य व मस्तिष्क की ज्ञानदीसि से (त्वा) = तेरे प्रति-(जुहोमि) = अपना अर्पण करता हूँ। धनों का संग्रह ही हमें प्रभु से दूर ले-जाता है। धन की चमक ही हमारी दृष्टि पर पर्दा डाल देती है और हम प्रभु-दर्शन से वञ्चित ही रह जाते हैं। ३. निरन्तर यज्ञमय जीवन बिताने पर तथा धनों के लोभ के त्याग से प्रभु के प्रति अपना अर्पण करने पर (य:) = जो (आशानाम्) = इन दिशाओं में (तुरीयः आशापाल:) = उत्तर दिशा का आशापाल 'ईशन' प्रभु है, (सः देव:) = वह प्रकाशमान् देव (न:) = हमारे लिए (इह) = इस जीवन में (सुभूतम्) = उत्तम स्थिति को (आवक्षत्) = सब प्रकार से प्राप्त कराए। विदृति द्वार ही शरीर में उत्तर द्वार है। यह हमें ब्रह्म की ओर ले-जाता है। हम ब्रह्म की ओर चलते हैं और ब्रह्म हमें 'सु-भूत' उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त कराते हैं। ४. प्रभु-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि [क] हम यज्ञमय जीवन बिताएँ, [ख] धनों के प्रति आसक्ति न रखते हुए उस तुरीय देव प्रभु के प्रति अपना अर्पण करें। ५. स्थूलतया मुख का सम्बन्ध स्थूलशरीर से है। ठीक खाएँगे तो यह शरीर ठीक बना रहेगा। पायु का कार्य ठीक होने पर ही सूक्ष्मशरीर के कार्य ठीक से चलते हैं, अन्यथा सब इन्द्रियाँ थकी-सी प्रतीत होती हैं, मस्तिष्क पीड़ित-सा हो जाता है। उपस्थ का संयम हमें कारणशरीर व आनन्दमयकोश में पहुँचाता है। जब हम प्राणसाधना से विति द्वार को खोलने के लिए प्रवृत्त होते हैं, तब समाधिजन्य तुरीय शरीर में पहुँचते हैं। यह तुरीय शरीर ब्रह्म ही है। यहाँ पहुँचने पर हम 'शान्त, शिव, अद्वैत स्थिति का अनुभव करते हैं। यह स्थिति ही "सु-भूत' है।
Essence
हम ब्रह्म का यज्ञ करते हैं उसके प्रति अपना अर्पण करते हैं तो प्रभु हमें सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त करानेवाले होते हैं।
Subject
अस्त्रामः-अश्लोण: