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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/31/2

35 Sukta
4 Mantra
1/31/2
Devata- आशापाला वास्तोष्पतयः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पाशविमोचन सूक्त
Mantra with Swara
य आशा॑नामाशापा॒लाश्च॒त्वार॒ स्थन॑ देवाः। ते नो॒ निरृ॑त्याः॒ पाशे॑भ्यो मु॒ञ्चतांह॑सोअंहसः ॥

ये । आशा॑नाम् । अ॒शा॒ऽपा॒ला: । च॒त्वार॑: । स्थन॑ । दे॒वा॒: । ते । न॒: । नि:ऋ॑त्या: । पाशे॑भ्य: । मुञ्चत॑ । अंह॑स:ऽअंहस: ॥

Mantra without Swara
य आशानामाशापालाश्चत्वार स्थन देवाः। ते नो निरृत्याः पाशेभ्यो मुञ्चतांहसोअंहसः ॥

ये । आशानाम् । अशाऽपाला: । चत्वार: । स्थन । देवा: । ते । न: । नि:ऋत्या: । पाशेभ्य: । मुञ्चत । अंहस:ऽअंहस: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ये) = जो आप (आशापाला:) = दिशाओं के रक्षक (आशानाम्) = दिशाओं के (चत्वारः) = चार (देवाः स्थन) = देव हो, (ते) = वे आप (नः) = हमें (निर्ऋत्या:) = मृत्यु व नाश [Death or destruction] के (पाशेभ्यः) = पाशों से (मुञ्चत) = मुक्त करो तथा (अहंसः अहंस:) = प्रत्येक पाप से मुक्त करो। २. यहाँ मुख व पायु के अधिष्ठातृदेव इन्द्र और वरुण हमें मृत्यु से बचाते हैं। इनके अमर होने पर हमें शारीरिक अमरता प्राप्त होती है। हमारा जीवन नौरोग बना रहता है। ३. उपस्थ व विदृति के अधिष्ठातृदेव 'यम और ईशान' हमारे जीवन को निष्पाप बनाते हैं। नीरोगता व निष्पापता का परस्पर सम्बन्ध उसी प्रकार है जैसेकि शरीर व मन का। शरीरस्थ रोग मानस विकृति का कारण होते है और मानस विकार शरीर के रोगों को जन्म देते हैं।
Essence
हम मुख व पायु के कार्य को व्यवस्थित करके नीरोग बनें, उपस्थ व विदृति के कार्य को ठीक करके निष्पाप बनें।
Subject
नित्रति व अंहस् के पाशों से मुक्ति