Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 1/3/9

35 Sukta
9 Mantra
1/3/9
Devata- मन्त्रोक्ता Rishi- अथर्वा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- मूत्र मोचन सूक्त
Mantra with Swara
यथे॑षु॒का प॒राप॑त॒दव॑सृ॒ष्टाधि॒ धन्व॑नः। ए॒वा ते॒ मूत्रं॑ मुच्यतां बहि॒र्बालिति॑ सर्व॒कम् ॥

यथा॒ । इ॒षु॒का । प॒रा॒ऽअप॑तत् । अव॑ऽसृष्टा । अधि॑ । धन्व॑न: ।ए॒व । ते॒ । मूत्र॑म् । मु॒च्य॒ता॒म् । ब॒हि: । बाल् । इति॑ । स॒र्व॒कम् ॥३.९॥

Mantra without Swara
यथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वनः। एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम् ॥

यथा । इषुका । पराऽअपतत् । अवऽसृष्टा । अधि । धन्वन: ।एव । ते । मूत्रम् । मुच्यताम् । बहि: । बाल् । इति । सर्वकम् ॥३.९॥

Meaning
१. (यथा) = जिस प्रकार (अधिधन्वन:) = धनुष पर से (अवसृष्टा) = छोड़ा हुआ (इषुका) = बाण (परापतत्) = सुदूर जा गिरता है, (एव) = इसीप्रकार बन्धनों के हट जाने पर [अवसृष्टा] (ते मूत्रम्) = तेरा यह विषेला मूत्र-द्रव (बहि: मुच्यताम्) = बाहर छूट जाए और (इति) = इसप्रकार (सर्वकम्) = तेरे सारे अङ्ग (बाल) = सबल हो जाएँ। २. मूत्र-द्रव के ठीक प्रकार से बाहर निकल जाने पर ही स्वास्थ्य का बहुत कुछ निर्भर करता है, अतः वैद्य इसकी व्यवस्था करके रुग्ण पुरुष को नीरोग बनाने के लिए यनशील होता है।
Essence
मुत्र-प्रवाह के ठीक होने से शरीर नीरोग रहता है।
Subject
मूत्रावसर्जन
Special
इन मन्त्रों में कहा है कि-मूत्र-निरोध का निवारण किया जाए [६]। आवश्यक होने पर मेहन-प्रभेद किया जाए [७]। मूत्राशय के द्वार को खोला जाए [८]। मूत्रावसर्जन होकर शरीर नीरोग हो [९]। इस स्वास्थ्य के लिए जल का प्रयोग भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है -

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.