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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 1/3/6

35 Sukta
9 Mantra
1/3/6
Devata- मन्त्रोक्ता Rishi- अथर्वा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- मूत्र मोचन सूक्त
Mantra with Swara
यदा॒न्त्रेषु॑ गवी॒न्योर्यद्व॒स्तावधि॒ संश्रु॑तम्। ए॒वा ते॒ मूत्रं॑ मुच्यतां ब॒हिर्बालिति॑ सर्व॒कम् ॥

यत् । आ॒न्त्रेषु॑ । ग॒वी॒न्योः । यत् । व॒स्तौ । अधि॑ । सम्ऽश्रु॑तम् ।ए॒व । ते॒ । मूत्र॑म् । मु॒च्य॒ता॒म् । ब॒हिः । बाल् । इति॑ । स॒र्व॒कम् ॥

Mantra without Swara
यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद्वस्तावधि संश्रुतम्। एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम् ॥

यत् । आन्त्रेषु । गवीन्योः । यत् । वस्तौ । अधि । सम्ऽश्रुतम् ।एव । ते । मूत्रम् । मुच्यताम् । बहिः । बाल् । इति । सर्वकम् ॥

Meaning
१. (यत्) = जो (मूत्रम्) = मूत्र-जल (आन्त्रेषु) = आँतों में, (गवीन्यो:) = मूत्र-नाड़ियों में, (यत्) = जो। (वस्तौ) = मूत्राशय में (अधिसंश्रुतम्) =[श्रवति-to go, move] गतिबाला हुआ है-वहाँ एकत्र हो गया है, (ते मूत्रम्) = तेरा वह मूत्र-जल (एव) = शर के प्रयोग से इसप्रकार (बहिः मुच्यताम्) बाहर छूट जाए, (इति) = जिससे कि (सर्वकम्) = सम्पूर्ण शरीर (बाल) = प्राणशक्ति-सम्पन्न बने। २. शरीर में मूत्र के रुक जाने से शरीर में विष फैल जाता है और तब यूरेमिया आदि रोग मृत्यु का कारण बनते हैं। मूत्र द्वारा ये विष शरीर से बाहर हो जाते हैं। इन विषों के निकल जाने पर शरीर के सब अङ्ग ठीक से प्राणशक्ति-सम्पन्न हो जाते हैं।
Essence
शर का प्रयोग हमें मूत्र-निरोध आदि रोगों से मुक्त करे।
Subject
'मूत्र-निरोध'-निवारण

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