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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 1/3/5

35 Sukta
9 Mantra
1/3/5
Devata- सूर्यः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- मूत्र मोचन सूक्त
Mantra with Swara
वि॒द्मा श॒रस्य॑ पि॒तरं॒ सूर्यं॑ श॒तवृ॑ष्ण्यम्। तेना॑ ते त॒न्वे॑३ शं क॑रं पृथि॒व्यां ते॑ नि॒षेच॑नं ब॒हिष्टे॑ अस्तु॒ बालिति॑ ॥

वि॒द्म । शरस्य॑ । पि॒तर॑म् । सूर्य॑म् । श॒तऽवृ॑ष्ण्यम् ।तेन॑ । ते॒ । त॒न्वे । शम् । क॒र॒म् । पृ॒थि॒व्याम् । ते॒ । नि॒ऽसेच॑नम् । ब॒हिः । ते॒ । अ॒स्तु॒ । बाल् । इति॑ ॥

Mantra without Swara
विद्मा शरस्य पितरं सूर्यं शतवृष्ण्यम्। तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति ॥

विद्म । शरस्य । पितरम् । सूर्यम् । शतऽवृष्ण्यम् ।तेन । ते । तन्वे । शम् । करम् । पृथिव्याम् । ते । निऽसेचनम् । बहिः । ते । अस्तु । बाल् । इति ॥

Meaning
१. हम (शरस्य) = शर के (पितरम्) = पितृभूत (शतवृष्णयम्) = शतश: शक्तियों के उत्पादन में उत्तम (सूर्यम्) = इस सूर्य को (मुञ्ज) = जानते हैं। २. इस सूर्य के द्वारा उस शर में सब प्राण स्थापित किये जाते हैं, (तेन) = उस प्राणशक्ति-सम्पन्न शर से (ते तन्वे) = तेरे शरीर के लिए मैं (शंकरम्) = शान्ति करता हूँ। (ते पृथिव्याम्) = तेरे पृथिवीरूप शरीर में (निषेचनम्) = इस शर के रस का सेचन होता है और (बाल् इति) = क्योंकि यह प्राणशक्ति का सञ्चार करनेवाला है, अत: (ते बहिः अस्तु) = तेरे शरीर से सब दोष बाहर हो जाए।

 
Essence
सूर्य से शक्ति-सम्पन्न होकर शर हमारे शरीरों को निर्दोष बनाता है।
Subject
सूर्य
Information
इस सूक्त के पाँच मन्त्रों में से प्रथम मन्त्र में पर्जन्य को शर का पिता कहा गया है, चतुर्थ में चन्द्र को तथा पाँचवें में सूर्य को। द्वितीय और तृतीय मन्त्र में मित्र और वरुण इस शर के पिता हैं। ये मित्र और वरुण वस्तुत: ('प्राणोदानौ वै मित्रावरुणौ') इस शतपथवचन [१।८।३।१२] के अनुसार प्राण और उदान हैं। 'प्राण' अम्लजन है और 'उदान' उद्जन है। ये दोनों मिलकर ही प्रथम मन्त्र के पर्जन्य का निर्माण करते हैं। एवं, ये दोनों मन्त्र प्रथम मन्त्र के व्याख्याभूत हो जाते हैं। (अर्धमसो वै मित्रावरुणौ, य एवं आपूर्यते स वरुणः, यो उपक्षीयते स मित्र:) [शतपथ २।४।४।१८] के अनुसार मित्र और वरुण कृष्ण व शुक्लपक्ष हैं और इनका सम्बन्ध चतुर्थ मन्त्र के चन्द्र से है।('अहोरात्रौ वै मित्रावरुणौ') [तां० २५।१०।१०] के अनुसार मित्र और वरुण दिन और रात हैं जिनका निर्माण सूर्य के अधीन है। यह सूर्य ही पञ्चम मन्त्र में शर का पितर कहा गया है। इस सारे विवेचन से यह स्पष्ट है कि मित्र और वरुण का सम्बन्ध 'पर्जन्य, चन्द्र और सूर्य' तीनों से है। यहाँ मित्र-वरुण के एक ओर पर्जन्य है तो दूसरी ओर चन्द्र और सूर्य। इस क्रम द्वारा भी उपर्युक्त सम्बन्ध सङ्केतित हो रहा है। इस सूक्त के पाँच मन्त्रों में पर्जन्य आदि पाँच को शर का पिता कहा गया है। वे सब शर में शतश: शक्तियों का आधान करते हैं और उससे शर हमारे शरीरों को निर्दोष बनाता है। इस सूक्त के

अगले चार मन्त्रों में मूत्र-दोष निवारण का उल्लेख है। इस दोष के दूरीकरण पर ही स्वास्थ्य का बहुत कुछ निर्भर होता है -

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