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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 1/29/6

35 Sukta
6 Mantra
1/29/6
Devata- अभीवर्तमणिः, ब्रह्मणस्पतिः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- राष्ट्र अभिवर्धन सूक्त
Mantra with Swara
स॑पत्न॒क्षय॑णो॒ वृषा॒भिरा॑ष्ट्रो विषास॒हिः। यथा॒हमे॒षां वी॒राणां॑ वि॒राजा॑नि॒ जन॑स्य च ॥

स॒प॒त्न॒ऽक्षय॑ण: । वृषा॑ । अ॒भिऽरा॑ष्ट्र: । वि॒ऽस॒स॒हि:।यथा॑। अ॒हम् । ए॒षाम् । वी॒राणा॑म् । वि॒ऽराजा॑नि । जन॑स्य । च॒ ॥

Mantra without Swara
सपत्नक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विषासहिः। यथाहमेषां वीराणां विराजानि जनस्य च ॥

सपत्नऽक्षयण: । वृषा । अभिऽराष्ट्र: । विऽससहि:।यथा। अहम् । एषाम् । वीराणाम् । विऽराजानि । जनस्य । च ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार मैं सूर्योदय के साथ ही प्रभुस्तबन प्रारम्भ करता हूँ (यथा) = जिससे कि (अहम्) = मैं सपलक्षयण: रोगकृमिरूप सपत्नों को नष्ट करनेवाला होऊँ, (वृषा) = शक्तिशाली बनूँ। (अभिराष्ट्र:) = [राष्ट्रम्=any national or public calamity] राष्ट्रीय विपत्ति को भी अभिभूत करनेवाला हो। अपने सपत्नों को नष्ट करके राष्ट्र के शत्रुओं को भी (विषसहिः) = पराभव करनेवाला बनूँ। २. (एषां वीराणां विराजानि) = मैं इन वीर पुरुषों में विशेषरूप से दीप्त हो (च) = और (जनस्य) = [विराजानि]-लोकों का रञ्जन करनेवाला बनूं। ३. वस्तुत: प्रत्येक व्यक्ति को 'अभिराष्ट्र व विषासहि' होना है, विशेषतः राजा को। राजा ने अपने कन्धे पर राष्ट्र के भार को धारण किया है। उस कर्त्तव्य को निभाने के लिए तो उसे अभीवर्तमणि के रक्षण द्वारा 'सपत्नक्षयण और वृषा' तो बनना ही है, साथ ही अभिराष्ट्र व विषासहि बनकर वह वीरों में चमकनेवाला व लोकों का रञ्जनवाला बने।
Essence
प्रभु का आराधन व 'अभीवर्तमणि' का रक्षण करता हुआ मैं सपत्नक्षयण, वृषा, अभिराष्ट्र व विषासहि बनें।
Subject
वृषा-विषासहि
Special
इस सूक्त में शरीर में सुरक्षित सोम को 'अभीवर्तमणि' कहा है। यह इन्द्र का सर्वतः वर्धन करती है [१]। सपत्नों का अभिवर्तन [पराभव] करने के कारण यह 'अभीवर्त' है [२]। सूर्य-चन्द्र व पृथिवी आदि अन्य भूतों के द्वारा इसका उत्पादन होता है [३]। यह हमें शक्तिशाली बनाकर निजी व राष्ट्रीय उन्नति के योग्य बनाती है [४]। प्रभु-स्मरण से मैं इस मणि को शरीर में रक्षित कर पाता हूँ [५]। रक्षित होकर यह मुझे दीप्त जीवनवाला बनाती है[६]। इसके रक्षण से ही हमें दीर्घ-जीवन प्राप्त होता है, अतः अगले सूक्त का ऋषि 'आयुष्कामः' आयु की कामनावाला 'अथर्वा' न डांवाडोल वृत्तिवाला है। इसकी आराधना है कि सब देव इसका रक्षण करें।