Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/29/4

35 Sukta
6 Mantra
1/29/4
Devata- अभीवर्तमणिः, ब्रह्मणस्पतिः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- राष्ट्र अभिवर्धन सूक्त
Mantra with Swara
अ॑भीव॒र्तो अ॑भिभ॒वः स॑पत्न॒क्षय॑णो म॒णिः। रा॒ष्ट्राय॒ मह्यं॑ बध्यतां स॒पत्ने॑भ्यः परा॒भुवे॑ ॥

अ॒भि॒ऽव॒र्त: । अ॒भि॒ऽभ॒व: । स॒प॒त्न॒ऽक्षय॑ण: । म॒णि: । रा॒ष्ट्रा॒य॑ । मह्य॑म् । ब॒ध्य॒ता॒म् । स॒ऽपत्ने॑भ्य: । प॒रा॒ऽभुवे॑ ॥

Mantra without Swara
अभीवर्तो अभिभवः सपत्नक्षयणो मणिः। राष्ट्राय मह्यं बध्यतां सपत्नेभ्यः पराभुवे ॥

अभिऽवर्त: । अभिऽभव: । सपत्नऽक्षयण: । मणि: । राष्ट्राय । मह्यम् । बध्यताम् । सऽपत्नेभ्य: । पराऽभुवे ॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. यह (मणिः) = सोमकणरूप मणि (अभीवर्त:) = शरीर में रोगों व मन की आवञ्छनीय वृत्तियों का अभिवर्त करनेवाली होती है-उनपर आक्रमण करके उन्हें दूर भगा देती है। (अभिभव:) = यह बाह्य शत्रुओं और अशुभ व्यवहार करनेवालों को भी अभिभूत करती है। (सपत्नक्षयण:) = शरीर के पति बनने की कामनावाले हमारे सपत्नभूत रोगकृमिरूप शत्रुओं को यह नष्ट करती है। २. यह मणि (मह्यम्) = मेरे लिए तथा (राष्ट्राय) = राष्ट्र के लिए राष्ट्र की उन्नति के लिए (बाध्यताम्) = शरीर में ही बद्ध की जाए। शरीर में ही सुरक्षितरूप से स्थापित हो। रोगों के दूर होने पर ही मेरे जीवन की उन्नति सम्भव होती है। [मशकेभ्यः धूमः मच्छरों के निवारण के लिए धुंआ है]। इसका स्थापन इसलिए भी आवश्यक है कि इससे शक्तिसम्पन्न बनकर ही युवक (पराभुवे) = शत्रुओं का पराभव करने में समर्थ होंगे और शत्रुओं के पराभूत होने पर ही राष्ट्रोन्नति सम्भव होती है।
Essence
यह अभीवर्तमणि रोगकृमिरूप सपत्नों को समाप्त करके वैयक्तिक उन्नति का साधन बनती है और युवकों को राष्ट्र के शत्रुओं के पराभव के लिए शक्तिसम्पन्न बनाकर राष्ट्रोन्नति का कारण होती है।
Subject
सपत्नक्षयण मणि