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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/29/3

35 Sukta
6 Mantra
1/29/3
Devata- अभीवर्तमणिः, ब्रह्मणस्पतिः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- राष्ट्र अभिवर्धन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒भि त्वा॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि सोमो॑ अवीवृधत्। अ॒भि त्वा॒ विश्वा॑ भू॒तान्य॑भीव॒र्तो यथास॑सि ॥

अ॒भि । त्वा॒ । दे॒व: । स॒वि॒ता । अ॒भि । सोम॑: । अ॒वी॒वृ॒ध॒त् । अ॒भि । त्वा॒ । विश्वा॑ । भू॒तानि॑ । अ॒भि॒ऽव॒र्त: । यथा॑ । अस॑सि ॥

Mantra without Swara
अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृधत्। अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि ॥

अभि । त्वा । देव: । सविता । अभि । सोम: । अवीवृधत् । अभि । त्वा । विश्वा । भूतानि । अभिऽवर्त: । यथा । अससि ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. शरीर में इस सोम-वीर्य को सूर्य-चन्द्र तथा पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि अन्य सब भूत बढानेवाले होते हैं। सूर्य ओषधियों में प्राणदायी तत्त्वों को रखता है, चन्द्रमा उनमें रस का सञ्चार करता है तथा पृथिवी आदि भूत उन ओषधियों में अन्य आवश्यक तत्त्वों की स्थापना करते हैं। अब ये ओषधियाँ हमारे आहार के रूप में अन्दर जाकर रस आदि के क्रम से सोम को जन्म देती हैं। यह सोम 'अभीवर्त' बनता है-सब शत्रुओं का अभिवर्तन-पराभव करनेवाला हो जाता है। २. हे अभीवर्तमणे! (त्वा) = तुझे (सविता देव:) = शक्ति को जन्म देनेवाला यह प्रकाशमय सूर्य (अभि अवीवृधत्) = आन्तर व बाह्य शक्ति के दृष्टिकोण से बढ़ाता है। इसप्रकार सूर्य से बढ़ाया जाकर त आन्तर शक्ति से रोगों को जीतता है तो बाह्य तेज से शत्रुओं को आक्रान्त करता है। ३. (सोमः) = चन्द्रमा भी तुझे (अभि) = [अवीवृधत्]-आन्तर व बाह्य शक्तियों के दृष्टिकोण से बढ़ाए। इन सूर्य और चन्द्रमा के अतिरिक्त (विश्वा भूतानि) = पृथिवी आदि सब भूत भौ (त्वा) = तुझे (अभि) = [अवीवृधन्]-बढ़ाएँ। (यथा) = जिससे इनसे प्रवृद्ध शक्तिवाला होकर तू (अभीवर्तः अससि) = अभीवर्त होता-शत्रुओं का पराभव करनेवाला होता है। सूर्य तुझमें प्राणों की उष्णता का सञ्चार करता है, चन्द्रमा रसात्मक शीतलता का। ('आपः ज्योति:') = इन दोनों तत्त्वों से युक्त होकर तू शत्रुओं का नाश करता है और हमारे जीवन को आनन्दमय बनाता है।
Essence
सूर्य-चन्द्र तथा पृथिवी आदि से शक्ति-सम्पन्न बना हुआ यह सोम हमारे शत्रुओं का पराभव करके 'अभीवर्त' नामवाला होता है।
Subject
सूर्य-चन्द्र तथा पृथिवी आदि भूतों की देन