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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/28/2

35 Sukta
4 Mantra
1/28/2
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- रक्षोघ्न सूक्त
Mantra with Swara
प्रति॑ दह यातु॒धाना॒न्प्रति॑ देव किमी॒दिनः॑। प्र॒तीचीः॑ कृष्णवर्तने॒ सं द॑ह यातुधा॒न्यः॑ ॥

प्रति॑ । द॒ह॒ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । प्रति॑ । दे॒व॒ । कि॒मी॒दिन॑: । प्र॒तीची॑: । कृ॒ष्ण॒ऽव॒र्त॒ने॒ । सम् । द॒ह॒ । या॒तु॒ऽधा॒न्य: ॥

Mantra without Swara
प्रति दह यातुधानान्प्रति देव किमीदिनः। प्रतीचीः कृष्णवर्तने सं दह यातुधान्यः ॥

प्रति । दह । यातुऽधानान् । प्रति । देव । किमीदिन: । प्रतीची: । कृष्णऽवर्तने । सम् । दह । यातुऽधान्य: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (देव) = दीतिमय ज्ञानवाले अग्ने! आप अपने अहिंसा व माधुर्य से परिपूर्ण उपदेशों से (यातुधानान्) = पीड़ा का आधान करनेवालों को (प्रतिदह) = भस्मीभूत कर दीजिए। (किमीदिन:) = क्या खाँऊ और क्या खाँऊ' सदा इसप्रकार की वृत्तिवालों को भी प्रति [दह]-भस्म कर दीजिाए। आपके उपदेशों से उनका यातुधानपना और किमीदिपना समाप्त हो जाए। 'यातुधान' यातुहान पीड़ा को दूर करनेवाले बन जाएँ। 'किमीदी' किन्द बन जाएँ 'क्या और क्या दूँ' यही सोचनेवाले हों। २. हे (कृष्णवर्तने) = आकर्षक मार्ग व बर्ताववाले! आप (प्रतीची:) = [प्रति अञ्च] धर्म से विमुख होकर जानेवाली (यातुधान्य:) = पीड़ा का आधान करनेवाली बहिनों को भी (सन्दह) = अपने उपदेशों व बर्तावों से भस्म कर दीजिए। वे पीड़ा देने के मार्ग को छोड़कर फिर से धर्म-मार्ग का अनुवर्तन करनेवाली हों। ३. प्रचारक को स्वयं तो देव होना ही चाहिए. स्वयं देव न होते हुए वह औरों को देव नहीं बना सकता। यह कृष्णवर्तनि हो। इसके वर्तने का मार्ग आकर्षक हो। यह दूसरों को अपनी ओर आकृष्ट करनेवाला हो। इसके प्रचार की विधि प्रभावक हो।
Essence
प्रचारक को 'देव, कृष्णवर्तनि' बनकर यातुधानों को 'यातुहान' बनाना है और किमीदियों को 'किन्द।
Subject
देव व कृष्णवर्तनि