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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/27/4

35 Sukta
4 Mantra
1/27/4
Devata- चन्द्रमाः, इन्द्राणी Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- स्वस्त्ययन सूक्त
Mantra with Swara
प्रेतं॑ पादौ॒ प्र स्फु॑रतं॒ वह॑तं पृण॒तो गृ॒हान्। इ॑न्द्रा॒ण्ये॑तु प्रथ॒माजी॒तामु॑षिता पु॒रः ॥

प्र । इ॒त॒म् । पा॒दौ॒ । प्र । स्फु॒र॒त॒म् । वह॑तम् । पृ॒ण॒त: । गृ॒हान् । इ॒न्द्रा॒णी । ए॒तु॒ । प्र॒थ॒मा । अजी॑ता । अमु॑षिता । पु॒र: ॥

Mantra without Swara
प्रेतं पादौ प्र स्फुरतं वहतं पृणतो गृहान्। इन्द्राण्येतु प्रथमाजीतामुषिता पुरः ॥

प्र । इतम् । पादौ । प्र । स्फुरतम् । वहतम् । पृणत: । गृहान् । इन्द्राणी । एतु । प्रथमा । अजीता । अमुषिता । पुर: ॥

Meaning
१. (अध) = अब (यातुधान्य:) = औरों के लिए पीड़ा का आधान करनेवाली (स्त्रियाँ मिथ:) = परस्पर भी (विकेश्य:) = बिखरे हुए केशोंवाली (विघ्नताम्) = परस्पर (मारने) = पीटनेवाली होती हैं और (अराय्य:) = न देने की वृत्तिवाली ये यातुधानियाँ (वितहान्ताम) = विविध प्रकारों से परस्पर हिंसा करनेवाली होती हैं। २. इसप्रकार परस्पर लड़ती हुई तथा हिंसात्मक कर्मों में लगी हुई (यातुधानी:) = ये यातुधानियाँ (पुत्रम्) = पुत्र को (अत्तु) = खा जाती हैं, अर्थात् उनके जीवन को नष्ट कर देती हैं, (उत) = और (स्वसारम्) = अपनी बहिन को व नप्त्यम्-नाती को भी खा जाती हैं, अर्थात् उनके जीवन को भी नष्ट कर देती है।
Essence
सन्तान को उत्तम बनाने के लिए आवश्यक है कि गृहपत्नियों परस्पर लड़ें नहीं । और हिंसात्मक कर्मों में भी प्रवृत्त न हों।
Subject
परस्पर लड़ने-झगड़ने से बचना
Special
सूक्त का संक्षिप्त विषय यह है कि प्रचारक ऐसी उत्तमता से प्रचार करे कि समाज से 'द्वयावी, किमीदी व यातुधान' दूर हो जाएँ। माताएँ भी यातुधानत्व को छोड़कर उत्तम कर्मों में लगी रहकर सन्तानों को उत्तम बनाएँ [१-४] । सन्तानों को उत्तम बनाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें 'अभीवर्तमणि' के रक्षण की शिक्षा दी जाए। इसके रक्षण से जीवन को उत्तम बनाते हुए वे 'वसिष्ठ' अत्यन्त उत्तम निवासवाले बनेंगे। यह वसिष्ठ ही अगले सूक्त का ऋषि है।

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