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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/27/2

35 Sukta
4 Mantra
1/27/2
Devata- चन्द्रमाः, इन्द्राणी Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- स्वस्त्ययन सूक्त
Mantra with Swara
विषू॑च्येतु कृन्त॒ती पिना॑कमिव॒ बिभ्र॑ती। विष्व॑क्पुन॒र्भुवा॒ मनो ऽस॑मृद्धा अघा॒यवः॑ ॥

विषू॑ची । ए॒तु॒ । कृ॒न्त॒ती । पिना॑कम्ऽइव । बिभ्र॑ती । विष्व॑क् । पु॒न॒:ऽभुवा॑: । मन॑: । अस॑म्ऽऋध्दा: । अ॒घ॒ऽयव॑: ॥१.२७.२॥

Mantra without Swara
विषूच्येतु कृन्तती पिनाकमिव बिभ्रती। विष्वक्पुनर्भुवा मनो ऽसमृद्धा अघायवः ॥

विषूची । एतु । कृन्तती । पिनाकम्ऽइव । बिभ्रती । विष्वक् । पुन:ऽभुवा: । मन: । असम्ऽऋध्दा: । अघऽयव: ॥१.२७.२॥

Meaning
१. हे (देव) = दीतिमय ज्ञानवाले अग्ने! आप अपने अहिंसा व माधुर्य से परिपूर्ण उपदेशों से (यातुधानान्) = पीड़ा का आधान करनेवालों को (प्रतिदह) = भस्मीभूत कर दीजिए। (किमीदिन:) = क्या खाँऊ और क्या खाँऊ' सदा इसप्रकार की वृत्तिवालों को भी प्रति [दह]-भस्म कर दीजिाए। आपके उपदेशों से उनका यातुधानपना और किमीदिपना समाप्त हो जाए। 'यातुधान' यातुहान पीड़ा को दूर करनेवाले बन जाएँ। 'किमीदी' किन्द बन जाएँ 'क्या और क्या दूँ' यही सोचनेवाले हों। २. हे (कृष्णवर्तने) = आकर्षक मार्ग व बर्ताववाले! आप (प्रतीची:) = [प्रति अञ्च] धर्म से विमुख होकर जानेवाली (यातुधान्य:) = पीड़ा का आधान करनेवाली बहिनों को भी (सन्दह) = अपने उपदेशों व बर्तावों से भस्म कर दीजिए। वे पीड़ा देने के मार्ग को छोड़कर फिर से धर्म-मार्ग का अनुवर्तन करनेवाली हों। ३. प्रचारक को स्वयं तो देव होना ही चाहिए. स्वयं देव न होते हुए वह औरों को देव नहीं बना सकता। यह कृष्णवर्तनि हो। इसके वर्तने का मार्ग आकर्षक हो। यह दूसरों को अपनी ओर आकृष्ट करनेवाला हो। इसके प्रचार की विधि प्रभावक हो।
Essence
प्रचारक को 'देव, कृष्णवर्तनि' बनकर यातुधानों को 'यातुहान' बनाना है और किमीदियों को 'किन्द।

 
Subject
देव व कृष्णवर्तनि

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