Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/26/4

35 Sukta
4 Mantra
1/26/4
Devata- मरुद्गणः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- एकावसाना पादनिचृद्गायत्री Suktam- सुख प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
सु॑षू॒दत॑ मृ॒डत॑ मृ॒डया॑ नस्त॒नूभ्यो॑ मय॑स्तो॒केभ्य॑स्कृ॒धि ॥

सु॒सू॒दत॑ । मृ॒डत॑ । मृ॒डय॑ । न॒: । त॒नूभ्य॑: । मय॑: । तो॒केभ्य॑: । कृ॒धि॒ ॥

Mantra without Swara
सुषूदत मृडत मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि ॥

सुसूदत । मृडत । मृडय । न: । तनूभ्य: । मय: । तोकेभ्य: । कृधि ॥

Meaning
१. हे प्राणो! (सषूदत) = [षद् क्षरणे] आप हमारे सब मलों का क्षरण-दूर करनेवाले होओ, शरीर के मलों को दूर करके हमें स्वस्थ बनाओ। मनों की मैल को दूर करके उन्हें निर्मल बनाओ तथा मस्तिष्क की कुण्ठता को दूर करके हमें तीन बुद्धि बनाओ। ऐसा बनाकर (मृडत) = हमें सुखी करो। वास्तविक सुख'शरीर, मन व मस्तिष्क' तीनों के नैर्मल्य में ही है। २. (न: तनूभ्य:) = हमारे शरीरों के लिए तो (मृडय) = सुख प्रदान करो ही (तोकेभ्य:) = हमारी सन्तानों के लिए भी (मयः) =  (कृधि) = कल्याण व नीरोगता कीजिए। हमारे शरीर स्वस्थ होंगे तो हमारे सन्तानों के शरीरों पर उनका प्रभाव पड़ेगा ही।
Essence
प्राणसाधना से नैर्मल्य को सिद्ध करके हम अपने व सन्तानों के स्वास्थ्य को प्राप्त करनेवाले हों।
Subject
अपना व सन्तानों का स्वास्थ्य
Special
संक्षेप में सूक्त का भाव यही है कि प्राणसाधना से नैर्मल्य को सिद्ध करके, देव बनकर, हम आधिदैविक आपत्तियों से बचें। यह प्राणसाधना हमें चित्तवृत्ति-निरोध के द्वारा 'अथर्वा' बनाती है। अथ अर्वाड्ह म अन्तर्मुखी वृत्तिवाले बनते हैं, साथ ही हममें वीरता का संचार होता है

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.