Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/26/3

35 Sukta
4 Mantra
1/26/3
Devata- मरुद्गणः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- गायत्री Suktam- सुख प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
यू॒यं नः॑ प्रवतो नपा॒न्मरु॑तः॒ सूर्य॑त्वचसः। शर्म॑ यच्छाथ स॒प्रथः॑ ॥

यू॒यम् । न॒: । प्र॒ऽव॒त॒: । न॒पा॒त् । मरु॑त: । सूर्य॑ऽत्वचस: । शर्म॑ । य॒च्छा॒थ॒ । स॒ऽमथा॑: ॥

Mantra without Swara
यूयं नः प्रवतो नपान्मरुतः सूर्यत्वचसः। शर्म यच्छाथ सप्रथः ॥

यूयम् । न: । प्रऽवत: । नपात् । मरुत: । सूर्यऽत्वचस: । शर्म । यच्छाथ । सऽमथा: ॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे (मरुतः) = प्राणो! (यूयम्) = आप (न:) = हमें (प्रवतः नपात्) = उच्च स्थान से न गिरने देनेवाले हो। प्राणसाधना हमें उच्च स्थिति में रखती है। इससे हममें दैवीभावों की वृद्धि होती है। केवल दैवीभावों का वर्धन ही नहीं, ये मरुत् (सुर्यत्वचस:) = सूर्य के समान ज्योतिर्मय त्वचा देनेवाले हैं। इनकी साधना से मनुष्य का स्वास्थ्य ऐसा उत्तम बनता है कि उसकी त्वचा सूर्य की भाँति चमकनेवाली बनती है। २. ('सूर्यत्वचसः') = शब्द का अर्थ यह भी हो सकता है कि ये मरुत् सूर्य को (त्वच) = [touch] छूनेवाली हैं, अर्थात् प्राणसाधना हमें सूर्यमण्डल का भेदन करके ब्रह्मलोक में ले-जानेवाली होती है। ३. हे मरुतो! आप (सप्रथा:) = विस्तृत (शर्म) = सुख (यच्छाथ) = दो। ये प्राण हमारे शरीरों को नीरोग, मनों को निर्मल तथा मस्तिष्क को दीस बनाकर विस्तृत सुखों को देनेवाले होते हैं।
Essence
प्राणसाधना हमें ऊपर-और-ऊपर ले-चलती है। यह हमें सूर्यमण्डल का भेदन करनेवाला बनाती है और विस्तृत सुख प्रदान करती है।
Subject
मरुतों की कल्याणकारिता