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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/26/2

35 Sukta
4 Mantra
1/26/2
Devata- सविता, भग इन्द्रः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- एकावसाना त्रिपदा साम्नी त्रिष्टुप् Suktam- सुख प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
सखा॒साव॒स्मभ्य॑मस्तु रा॒तिः सखेन्द्रो॒ भगः॑। स॑वि॒ता चि॒त्ररा॑धाः ॥

सखा॑ । अ॒सौ । अ॒स्मभ्य॑म् । अ॒स्तु॒ । रा॒ति: । सखा॑ । इन्द्र॑: । भग॑: । स॒वि॒ता । चि॒त्रऽरा॑धा: ॥

Mantra without Swara
सखासावस्मभ्यमस्तु रातिः सखेन्द्रो भगः। सविता चित्रराधाः ॥

सखा । असौ । अस्मभ्यम् । अस्तु । राति: । सखा । इन्द्र: । भग: । सविता । चित्रऽराधा: ॥

Meaning
१. (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (असौ) = वह (राति:) = दान देने की भावना (सखा अस्तु)-मित्र हो। अदानशीलता ही सबसे बड़ा शत्रु है, यही देव-विपरीत भाव है। देव देते हैं, असुर हड़प कर जाते हैं। दान यज्ञ की चरम सीमा है। यह लोभ के मूल पर कुठाराघात करता है और इसप्रकार व्यसन-वृक्ष को उखाड़ फेंकता है। २. (इन्द्रः सखा) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु हमारा सखा हो। इन्द्र शब्द जितेन्द्रियता की सूचना देता है। जितेन्द्रियता ही परमेश्वर्यता का कारण बनती है। जितेन्द्रियता ही वस्तुतः उस वृत्त का केन्द्र है, जिसकी परिधि सब सद्गुणों से बनी हुई है। ३. (भग:) = भजनीय धन हमारा मित्र हो। वही धन भजनीय है जो औरों के साथ बाँटकर खाया जाता है। केवल अपने लिए विनियुक्त होनेवाला धन निधन का कारण बनता है। यही भाव 'यज्ञशेष को अमृत' नाम देकर व्यक्त किया गया है। ४. (सविता) = यह निर्माण की देवता है। जगदुत्पादक प्रभु 'सविता' हैं। मैं भी निर्माण की वृत्तिवाला बनकर आधिदैविक कष्टों से ऊपर उत्। जिस राष्ट्र में निर्माणरुचि जनता का बाहुल्य होता है, वह आधिदैविक कष्टों से बचा रहता है। ५. (चित्रराधा:) = ज्ञानरूप अद्भुत सम्पत्तिवाला प्रभु हमारा मित्र हो। ज्ञान को ही वास्तविक सम्पत्ति समझने पर हमारी वृत्ति उत्कृष्ट होगी और हम आधिदैविक कष्टों के शिकार न होंगे।
Essence
'दानवृत्ति, जितेन्द्रियता, मिलकर सेवनीय धन, निर्माणरुचिता, जान को ही सम्पत्ति समझना'-ये बातें राष्ट्र को आधिदैविक कष्टों से बचाती हैं।
Subject
दिव्य भावों के साथ मित्रता

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