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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/25/4

35 Sukta
4 Mantra
1/25/4
Devata- यक्ष्मनाशनोऽग्निः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- पुरोऽनुष्टुप् त्रिष्टुप् Suktam- ज्वरनाशक सूक्त
Mantra with Swara
नमः॑ शी॒ताय॑ त॒क्मने॒ नमो॑ रू॒राय॑ शो॒चिषे॑ कृणोमि। यो अ॑न्ये॒द्युरु॑भय॒द्युर॒भ्येति॒ तृती॑यकाय॒ नमो॑ अस्तु त॒क्मने॑ ॥

नम॑: । शी॒ताय॑ । त॒क्मने॑ । नम॑: । रू॒राय॑ । शो॒चिषे॑ । कृ॒णो॒मि॒ । य: । अ॒न्ये॒द्यु: । उ॒भ॒य॒ऽद्यु: । अ॒भि॒ऽएति॑ । तृती॑यकाय । नम॑: । अ॒स्तु । त॒क्मने॑ ॥

Mantra without Swara
नमः शीताय तक्मने नमो रूराय शोचिषे कृणोमि। यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येति तृतीयकाय नमो अस्तु तक्मने ॥

नम: । शीताय । तक्मने । नम: । रूराय । शोचिषे । कृणोमि । य: । अन्येद्यु: । उभयऽद्यु: । अभिऽएति । तृतीयकाय । नम: । अस्तु । तक्मने ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (शीताय तक्मने नमः) = हम शीतञ्बर के लिए नमस्कार करते हैं, इससे दूर से ही बचने का प्रयत्न करते हैं। २. (रूराय शोचिषे) = गर्जना करनेवाले सन्तापकारी बुखार के लिए (नमः कृणोमि) = मैं नमस्कार करता हूँ। वह ज्वर, जिसमें गर्मी की अधिकता से मनुष्य बड़बड़ाने लगता है, 'रूरशोचिः' कहा गया है। मैं इससे बचने क लिए प्रार्थना करता हूँ। ३. (यः) = जो (अन्येयुः) = एक दिन छोड़कर आता है, (उभयद्युः अभ्येति) = दो-दो दिन करके आता है। दो दिन आया, फिर एक दिन न आकर दो दिन आता है-यह ज्वर 'उभया' कहलाता है। (तृतीयकाय) = जो दो दो दिन छोड़कर तीसरे दिन आता है, उस (तक्मने) = ज्वर के लिए (नमः अस्तु) = नमस्कार हो, अर्थात् मैं अन्ये, उभयद्य व तृतीयक ज्वरों से बचा रहूँ। ४. इन सब ज्वरों के लिए नमस्कार हो, अर्थात् इनसे मैं बचा रहूँ। 'नमः अस्तु' इन शब्दों में यह भाव भी अन्तर्निहित प्रतीत होता है कि मैं प्रभु के प्रति नतमस्तक होता हुआ इन ज्वरों का शिकार न होऊँ। प्रभु-भजन की वृत्ति भी मनुष्य के व्यवहार में उन वाञ्छनीय परिवर्तनों को उत्पन्न करती है जो ज्वरादि से दूर रहने में सहायक -
Essence
प्रभु-भक्त जीवन की दिशा को ठीक रखने के कारण ज्वरादि से बचा रहता है। विशेष—इस सूक्त में ज्वररूप आध्यात्मिक कष्ट से बचने का संकेत है। अब ब्रह्मा बनकर आधिदैविक कष्टों से बचने का उल्लेख होता है
Subject
विविध ज्वर