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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/25/3

35 Sukta
4 Mantra
1/25/3
Devata- यक्ष्मनाशनोऽग्निः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- विराड्गर्भा त्रिष्टुप् Suktam- ज्वरनाशक सूक्त
Mantra with Swara
यदि॑ शो॒को यदि॑ वाभिशो॒को यदि॑ वा॒ राज्ञो॒ वरु॑ण॒स्यासि॑ पु॒त्रः। ह्रूडु॒र्नामा॑सि हरितस्य देव॒ स नः॑ संवि॒द्वान्परि॑ वृङ्ग्धि तक्मन् ॥

यदि॑ । शो॒क: । यदि॑ । वा॒ । अ॒भि॒ऽशो॒क: । यदि॑ । वा॒ । राज्ञ॑: । वरु॑णस्य । असि॑ । पु॒त्र: ।ह्रुडु॑: । नाम॑ । अ॒सि॒ । ह॒रि॒त॒स्य॒ । दे॒व॒ । स: । न॒: । स॒म्ऽवि॒द्वान् । परि॑ । वृ॒ङ्ग्धि॒ । त॒क्म॒न् ॥

Mantra without Swara
यदि शोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणस्यासि पुत्रः। ह्रूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान्परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥

यदि । शोक: । यदि । वा । अभिऽशोक: । यदि । वा । राज्ञ: । वरुणस्य । असि । पुत्र: ।ह्रुडु: । नाम । असि । हरितस्य । देव । स: । न: । सम्ऽविद्वान् । परि । वृङ्ग्धि । तक्मन् ॥

Meaning
१. हे- (तक्मन) = उचर! (यदि) = यदि तु (शोकः असि) = बाह्य सम्पत्ति व सन्तान के नाश से होनेवाले शोक का परिणाम है, (यदि वा) = अथवा (अभिशोकः असि) = किन्हीं आन्तरिक व बाह्य दोनों कारणों से उत्पन्न होनेवाले शोक का परिणाम है, (यदि वा) = अथवा तू (वरुणस्य राज्ञः पुत्रः असि) = वरुण राजा का पुत्र है तो तू (हडः नाम असि) = कैंपकैंपी को लानेवाला होने से हडु नामवाला है। तू (हरितस्य देव) = पीलिया को देनेवाला है। (स:) = वह तू (न:) = हमें (संविद्वान्) = सम्यक्तया जानता हुआ कि हम प्रभु-भक्त होने से वासना से दूर हैं, (परिवृग्धि) = सब प्रकार से छोड़नेवाला हो। २. शोक के कारण तो ज्वर उत्पन्न हो ही जाता है। यहाँ ज्वर को वरुण राजा का पुत्र इसलिए कहा है कि वरुण जलाधिपति है। यह जल इधर-उधर गढ़ों में ठहरता है, तो मच्छरों की उत्पत्ति का कारण बनता है। ये मच्छर ज्वर को फैलानेवाले होते हैं, अतः ज्वर से बचने के लिए जहाँ शोक से बचना है, वहाँ मच्छरों की उत्पत्ति को रोकने की भी व्यवस्था करनी चाहिए। इस व्यवस्थापक को ही आजकल की भाषा में सैनिटेशन का प्रबन्ध कहते हैं।
Essence
ज्वर शोक से उत्पन्न होता है, अतः संसार-स्वरूप का चिन्तन करते हुए शोक नहीं करना है तथा ऐसी व्यवस्था भी वाञ्छनीय है कि पानी आदि के ठहरे रहने से मच्छर उत्पन्न न हो पाएँ।
Subject
ज्वर के अन्य तीन कारण

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