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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/25/2

35 Sukta
4 Mantra
1/25/2
Devata- यक्ष्मनाशनोऽग्निः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- विराड्गर्भा त्रिष्टुप् Suktam- ज्वरनाशक सूक्त
Mantra with Swara
यद्य॒र्चिर्यदि॒ वासि॑ शो॒चिः श॑कल्ये॒षि यदि॑ वा ते ज॒नित्र॑म्। ह्रूडु॒र्नामा॑सि हरितस्य देव॒ स नः॑ संवि॒द्वान्परि॑ वृङ्ग्धि तक्मन् ॥

यदि॑ । अ॒र्चि: । यदि॑ । वा॒ । असि॑ । शो॒चि: । श॒क॒ल्य॒ऽए॒षि । यदि॑ । वा॒ । ते॒ । ज॒नित्र॑म् । ह्रुडु॑: । नाम॑ । अ॒सि॒ । ह॒रि॒त॒स्य॒ । दे॒व॒ । स: । न॒: । स॒म्ऽवि॒द्वान् । परि॑ । वृ॒ङग्धि॒ । त॒क्म॒न् ॥

Mantra without Swara
यद्यर्चिर्यदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि वा ते जनित्रम्। ह्रूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान्परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥

यदि । अर्चि: । यदि । वा । असि । शोचि: । शकल्यऽएषि । यदि । वा । ते । जनित्रम् । ह्रुडु: । नाम । असि । हरितस्य । देव । स: । न: । सम्ऽविद्वान् । परि । वृङग्धि । तक्मन् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (तक्मन्) = ज्वर! (यदि) = यदि [क] (अचिः असि) = तू ज्वालारूप है, अर्थात् यदि तेरे कारण शरीर में ताप की लपटें-सी उठती प्रतीत होती हैं, [ख] (यदि वा) = अथवा (शोचिः असि) = तेरे कारण हृदय में कुछ हतोत्साहता-[depression]-सा प्रतीत होता है, [ग] (यदि वा) = अथवा (ते जनित्रम्) = तेरा प्रादुर्भाव ऐसा है कि शकली (एषि) = तू अङ्गों को तोड़ता हुआ आता है, [ब] अथवा (हड़: नाम असि) कैंपकपी लानेवाला होने से तू हडु नामवाला है [ङ] अथवा (हरितस्य) = देव-तू खून को सुखाकर पीलापन [jaundice] देनेवाला है, जैसा भी तू है (सः) = वह तु (न:) = हमें (संविद्वान) = सम्यक्तया प्रभु-भक्ति की भावनावाला जानता हुआ (परिवृग्धि) = सब प्रकार से छोड़नेवाला हो। २. ज्वर के ये विविध परिणाम तभी भोगने पड़ते हैं जब हम प्रभु-भक्ति को छोड़कर अपने जीवन में वासना को स्थान देते हैं।
Essence
'ताप, हतोत्साह, अङ्गों का टूटना, कँपकँपी, रुधिर की कमी-ये सब ज्वर के परिणाम हैं, इनसे बचने के लिए आवश्यक है कि हम हृदय में वासनाओं को स्थान न दें।
Subject
ज्वर के परिणाम