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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/24/4

35 Sukta
4 Mantra
1/24/4
Devata- आसुरी वनस्पतिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- श्वेत कुष्ठ नाशन सूक्त
Mantra with Swara
श्या॒मा स॑रूपं॒कर॑णी पृथि॒व्या अध्युद्भृ॑ता। इ॒दमू॑ षु॒ प्र सा॑धय॒ पुना॑ रू॒पाणि॑ कल्पय ॥

श्या॒मा । स॒रू॒प॒म्ऽकर॑णी । पृ॒थि॒व्या: । अधि॑ । उत्ऽभृ॑ता। इ॒दम् । ऊं॒ इति॑ । सु । प्र । सा॒ध॒य॒ । पुन॑: । रू॒पाणि॑ । क॒ल्प॒य॒ ॥

Mantra without Swara
श्यामा सरूपंकरणी पृथिव्या अध्युद्भृता। इदमू षु प्र साधय पुना रूपाणि कल्पय ॥

श्यामा । सरूपम्ऽकरणी । पृथिव्या: । अधि । उत्ऽभृता। इदम् । ऊं इति । सु । प्र । साधय । पुन: । रूपाणि । कल्पय ॥

Meaning
१. त्वचा में रंग देनेवाले तत्त्व के निकल जाने से ही कुष्ठ रोग उत्पन्न होता है। इस रंगदायी तत्व [colouring matter] को फिर से शरीर में प्राप्त करा देनेवाली यह (श्यामा) = श्यामता देनेवाली ओषधि (सरूपं करणी) = समानरूपता करनेवाली है। २. यह ओषधि (पृथिव्याः) = पृथिवी से (उद्धृता) = बाहर धारण की गई है। 'पृथिवी से बाहर निकालना' यह भाव स्पष्ट कर रहा है कि यह कन्द आदि के रूप की कोई ओषधि है। ३. हे श्यामा! तू (इदम्) = इस हमारे शरीर को (उ) = निश्चय से (सुप्रसाधय) = अच्छी प्रकार अलंकृत कर दे, रोग को दूर करके इसे ठीक सिद्ध कर दे। (पुन:) = फिर (रूपाणि कल्पय) = तू त्वचा में रूप बना दे। जो रङ्ग देनेवाला तत्त्व कम हो गया था, उसकी पुनः स्थापना कर दे।
Essence
'श्यामा' ओषधि रंग देनेवाले तत्त्व को उपस्थित करके त्वचा को फिर से सरूप करनेवाली है।
Subject
श्यामा
Special
अगले सूक्त का विषय भी 'तक्मा'-ज्वर है। इसे अपने से दूर रखनेवाला व्यक्ति 'अङ्गिरा'-सब अङ्गों में रसवाला है। यह ज्वर को परिपक्क करके दूर करनेवाला होने से 'भृगु' है [भ्रस्ज पाके]। यह 'भृगु अङ्गिरा' ही अगले सूक्त का ऋषि है। यह प्रार्थना करता है

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