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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/23/4

35 Sukta
4 Mantra
1/23/4
Devata- असिक्नी वनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- श्वेत कुष्ठ नाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॑स्थि॒जस्य॑ कि॒लास॑स्य तनू॒जस्य॑ च॒ यत्त्व॒चि। दूष्या॑ कृ॒तस्य॒ ब्रह्म॑णा॒ लक्ष्म॑ श्वे॒तम॑नीनशम् ॥

अ॒स्थि॒ऽजस्य॑ । कि॒लास॑स्य । त॒नू॒ऽजस्य॑ । च॒ । यत् । त्व॒चि । दूप्या॑ । कृ॒तस्य॑ । ब्रह्म॑णा । लक्ष्म॑ । श्वे॒तम् । अ॒नी॒न॒श॒म् ॥

Mantra without Swara
अस्थिजस्य किलासस्य तनूजस्य च यत्त्वचि। दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम् ॥

अस्थिऽजस्य । किलासस्य । तनूऽजस्य । च । यत् । त्वचि । दूप्या । कृतस्य । ब्रह्मणा । लक्ष्म । श्वेतम् । अनीनशम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यदि कुष्ठ का प्रभाव अस्थि तक पहुँच गया है तो यह 'अस्थिज किलास' कहलाएगा। यदि अभी उसका प्रभाव गहराई तक नहीं गया तो वह 'तनूज' कहलाता है। ये दोनों आहार व्यवहार के दोषों के कारण ही उत्पन्न होते हैं, अत: कहते हैं कि-(अस्थिजस्य किल्लासस्य) = हड्डी तक पहुंचे हुए कुष्ठ का (च) = और (तनूजस्य) = शरीर में उपरले पृष्ठ पर उत्पन्न हुए-हुए कुष्ठ का (यत्) = जो (त्वचि) = त्वचा में (श्वेतं लक्ष्म) = श्वेत धव्या है उसे तथा (दूष्या कृतस्य) = दूषित आहार विहार के द्वारा उत्पादित किलास को (ब्रह्मणा) = ज्ञान के द्वारा (अनीनशम्) = मैं नष्ट करता हूँ। २. ज्ञान के अभाव में ही आहार-व्यवहार के दोष उत्पन्न होते हैं और उन दोषों से यह कुष्ठ-विकार उत्पन्न होता है। ज्ञान के द्वारा आहार-व्यवहार की शुद्धि होने पर इन विकारों की आंशका जाती रहती है।
Essence
ज्ञान के द्वारा आहार-व्यवहार को शुद्ध करके हम कुष्ठ आदि विकारों को उत्पन्न न होने दें।
Subject
ज्ञानरूप महौषध
Special
इस सूक्त का ही विषय अगले सूक्त में भी प्रतिपादित हो रहा है। इस सूक्त में "ब्रह्मा' आसुरी वनस्पति के प्रयोग से कुष्ठ को दूर करते हैं -