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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/21/4

35 Sukta
4 Mantra
1/21/4
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
अपे॑न्द्र द्विष॒तो मनो॑ ऽप॒ जिज्या॑सतो व॒धम्। वि म॒हच्छर्म॑ यच्छ॒ वरी॑यो यावया व॒धम् ॥

अप॑ । इ॒न्द्र॒ । द्वि॒ष॒त: । मन॑: । अप॑ । जिज्या॑सत: । व॒धम् ।वि । म॒हत् । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । वरी॑य: । य॒व॒य॒ । व॒धम् ॥

Mantra without Swara
अपेन्द्र द्विषतो मनो ऽप जिज्यासतो वधम्। वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम् ॥

अप । इन्द्र । द्विषत: । मन: । अप । जिज्यासत: । वधम् ।वि । महत् । शर्म । यच्छ । वरीय: । यवय । वधम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो! (द्विषत: मनः अप) = द्वेष करनेवाले के मन को हमसे दूर कीजिए, अर्थात् हम अपने मन में किसी के प्रति द्वेष न करें, (जिग्यासत:) = [ज्या बयोहानी] आयुष्य का नाश करनेवाले के (वधम्) = वध को (अप) = हमसे दूर कीजिए। हम किसी के आयुष्यनाश की वृत्तिवाले न हों। २. हे प्रभो! आप हमारे लिए (महत्) = शर्म महनीय सुख को (यच्छ) = प्राप्त कराइए और (वधम्) = वध को (वरीय: यावय) = हमसे बहुत दूर कीजिए। हमारे मन में किसी के वध इत्यादि का विचार ही उत्पन्न न हो। ३. जहाँ राजा का कर्तव्य है कि वह राष्ट्र की अन्त:-बाह्य शत्रुओं से रक्षा करे, वहाँ प्रत्येक प्रजावर्ग का भी यह कर्तव्य है कि वह अपने जीवन में से द्वेष आदि भावना को दूर करके सारा व्यवहार करे।
Essence
हम अपने मनों से द्वेष व दूसरों के आयुष्य-नाश की भावना व बध को दूर करें और इसप्रकार उत्तम नागरिक बनें।
Subject
'द्वेष, आयुष्यनाश व वध' से दूर
Special
विशेष-सूक्त के आरम्भ में कहा है कि उत्तम व्यवस्था से राजा राष्ट्र में अभय का सञ्चार करे [१]। लोगों के हृदय भी द्वेष व वध आदि की भावनाओं से रहित हों[४]। यह द्वेष से शून्य होना हमें हृदय की जलन व पीलापन आदि रोगों से बचाएगा। इन रोगों के दूरीकरण के लिए सूर्यकिरणों का भी अत्यधिक महत्त्व है।