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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/21/3

35 Sukta
4 Mantra
1/21/3
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
वि रक्षो॒ वि मृधो॑ जहि॒ वि वृ॒त्रस्य॒ हनू॑ रुज। वि म॒न्युमि॑न्द्र वृत्रहन्न॒मित्र॑स्याभि॒दास॑तः ॥

वि । रक्ष॑: । वि । मृध॑: । ज॒हि॒ । वि । वृ॒त्रस्य॑ । हनू॒ इति॑ । रु॒ज॒ । वि । म॒न्युम् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । ‍अ॒मित्र॑स्य । अ॒भि॒ऽदास॑त: ॥

Mantra without Swara
वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज। वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः ॥

वि । रक्ष: । वि । मृध: । जहि । वि । वृत्रस्य । हनू इति । रुज । वि । मन्युम् । इन्द्र । वृत्रऽहन् । ‍अमित्रस्य । अभिऽदासत: ॥

Meaning
१. हे (इन्द्र) = शत्रुनाशक ! राष्ट्र के ऐश्वर्य को बढ़ानेवाले राजन् ! (रक्षः) = अपने रमण के लिए औरों का क्षय करनेवाले, औरों का नाश करके अपने भोगों को बढ़ानेवाले पुरुषों को (विजहि) = विशेषरूप से नष्ट कीजिए। (मृधः) = प्राणघातक पुरुषों को तो अलग कौजिए ही। (वृत्रस्य) = औरों की उन्नति में सदा रोड़ा अटकानेवाले के (हन: विरूज) = जबड़ों को तोड़ दीजिए, अर्थात् उनकी शक्ति को कम कीजिए। २. हे (वृत्रहन्) = वृत्रों का विनाश करनेवाले राजन्! (अभिदासतः अमित्रस्य) = हमें अपना दास बनानेवाले शत्रु के (मन्युम्) = उत्साह को (वि) = विनष्ट कीजिए। उसपर आक्रमण करके ऐसा दिखाइए कि उसका हमपर आक्रमण करने का उत्साह ही नष्ट हो जाए।
Essence
राजा राक्षसी वृत्तिवाले, हिंसक, उन्नतिविघातक पुरुषों को दूर करे, बाह्य आक्रान्ताओं को भी समाप्त करे।
Subject
वृत्रों का विनाश

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