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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/21/2

35 Sukta
4 Mantra
1/21/2
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
वि न॒ इन्द्र॒ मृधो॑ जहि नी॒चा य॑च्छ पृतन्य॒तः। अ॑ध॒मं ग॑मया॒ तमो॒ यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति ॥

वि । न॒: । इ॒न्द्र॒: । मृध॑: । ज॒हि॒ । नी॒चा । य॒च्छ॒ । पृ॒त॒न्य॒त: । अ॒ध॒मम् । ग॒म॒य॒ । तम॑: । य: । अ॒स्मान् । अ॒भि॒ऽदास॑ति ॥

Mantra without Swara
वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः। अधमं गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति ॥

वि । न: । इन्द्र: । मृध: । जहि । नीचा । यच्छ । पृतन्यत: । अधमम् । गमय । तम: । य: । अस्मान् । अभिऽदासति ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले राजन् । (नः मृधः) = हमारे हिंसकों को (विजहि) = आप विशेषरूप से नष्ट कीजिए। हिंसक वृत्तिवाले पुरुषों का प्रजा से दूर करना आवश्यक ही है। २. (पृतन्यत:) = सेना के द्वारा आक्रमण करनेवालों को नीचा (यच्छ) = पाँवों तले करनेवाले होओ। देश पर सेना के साथ आक्रमण करनेवाले शत्रुओं का प्रबल मुकाबला करके उन्हें नीचा दिखाना आवश्यक है। २. (यः) = जो (अस्मान) = हमें (अभिदासति) = दास बनाता है, उसे (अधमं तमः गमय) = घने अन्धकार में प्राप्त कराइए। दास बनाने की वृत्तिवाले लोगों को कैद में रखना आवश्यक है।
Essence
हिंसकों को राजा वध दण्ड दे, सैनिक आक्रमण करनेवालों को पूर्ण पराजय प्राप्त कराए और स्वतन्त्रता का अपहरण करनेवालों को अन्धकारमय कारागार में रखें।
Subject
अन्त: व बाह्य शत्रुओं का दूरीकरण