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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/20/4

35 Sukta
4 Mantra
1/20/4
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
शा॒स इ॒त्था म॒हाँ अ॑स्यमित्रसा॒हो अ॑स्तृ॒तः। न यस्य॑ ह॒न्यते॒ सखा॒ न जी॒यते॑ क॒दा च॒न ॥

शा॒स: । इ॒त्था । म॒हान् । अ॒सि॒ । अ॒मि॒त्र॒ऽस॒ह: । अ॒स्तृ॒त: ।न । यस्य॑ । ह॒न्यते॑ । सखा॑ । न । जी॒यते॑ । क॒दा । च॒न ॥

Mantra without Swara
शास इत्था महाँ अस्यमित्रसाहो अस्तृतः। न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदा चन ॥

शास: । इत्था । महान् । असि । अमित्रऽसह: । अस्तृत: ।न । यस्य । हन्यते । सखा । न । जीयते । कदा । चन ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. प्रभु अथर्वा से कहते हैं-(शास:) = तू अपना शासन करनेवाल बन । (इत्था) = इस प्रका ही तू (महान् असि) = बड़ा होता है। अपना विजय करनेवाला ही सर्वमहान् विजेता है। (अमित्र साह:) = अपना विजय करके तू शत्रुओं का पराभव करता है और (अस्तृतः) = अहिंसित होता है। जिस समय हम अपना शासन करके राग-द्वेष आदि को जीत पाते हैं, उसी समय हम महान् होते हैं, बाह्य शत्रुओं को भी जीतनेवाले होते हैं और किसी प्रकार से हिसित नहीं होते। २. (यस्य) = जिसका (सखा) = मित्र (न हन्यते) = नहीं मारा जाता वह (कदाचन) = कभी भी (न जीयते) = पराजित नहीं होता। यदि हममें स्नेह का भाव बना रहता है तो हम कभी भी पराभूत नहीं होते। इस मन्त्र-भाग का यह अर्थ भी द्रष्टव्य है कि जो प्रभुरूप मित्र को नहीं भूलता वह अपराभूत बना रहता है।
Essence
आत्मविजय हमें महान् बनाती है और मित्रभाव हमें अपराजित बनाता है।
Subject
आत्मशासन व महत्ता
Special
सूक्त के आरम्भ में प्रार्थना है कि हमारा प्रत्येक कार्य मेल को बढ़ानेवाला हो [१] । समाति पर कहा है कि हम आत्मविजयी बनकर अपराजित बनें [४]। अगले सूक्त में

भी यही अथर्वा आराधना करता है कि -