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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/20/3

35 Sukta
4 Mantra
1/20/3
Devata- वरुणः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
इ॒तश्च॒ यद॒मुत॑श्च॒ यद्व॒धं व॑रुण यावय। वि म॒हच्छर्म॑ यच्छ॒ वरी॑यो यावया व॒धम् ॥

इ॒त: । च॒ । यत् । अ॒मुत॑: । च॒ । यत् । व॒धम् । व॒रु॒ण॒ । य॒व॒य॒ । वि । म॒हत् । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । वरी॑य: । य॒व॒य॒ । व॒धम् ॥

Mantra without Swara
इतश्च यदमुतश्च यद्वधं वरुण यावय। वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम् ॥

इत: । च । यत् । अमुत: । च । यत् । वधम् । वरुण । यवय । वि । महत् । शर्म । यच्छ । वरीय: । यवय । वधम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.हे (वरुण) = द्वेष-निवारण की देवते! तु (यत् इतः च) = जो इधर से होनेवाला (च) = और (यत्) = जो (अमुत:) = उधर से होनेवाला (वधम्) = वध है, उसे (यावय) = हमसे पृथक्क र दे। जब हममें द्वेष होता है तब यह द्वेष हमारे अन्दर विषयों को जन्म देकर हमारा वध करनेवाला होता है। यह वध यहाँ 'इत:' [इधर से] इस शब्द द्वारा सूचित हुआ है। इस द्वेष के होने पर हम शत्रुओं से आक्रान्त होने योग्य होते हैं और यह वध यहाँ 'अमुत:' [उधर से] शब्द से संकेतित हो रहा है। इन दोनों ही वधों को वरुण हमसे दूर करते हैं। द्वेष-निवारण की देवता हमें इस उभयविध वध से बचाती है। २. इस वध से बचाकर हे वरुण! (महत् शर्म) = महान् कल्याण व सुख को (वियच्छ) = विशेषरूप से प्राप्त कराइए। द्वेष के न होने पर हम आन्तरिक व बाह्य वध से बचकर सुखी जीवनवाले होते हैं। हे वरुण! निढेषता की देवते! (वधम्) = वध को (वरीयः यावय) = हमसे बहुत दूर कर दीजिए। वस्तुत: द्वेष के अभाव में वध हमारे समीप आ ही नहीं सकता।
Essence
हम द्वेष से दूर हों। द्वेष से ऊपर उठकर आन्तर व बाह्य वध से आक्रान्त न हों।
Subject
निर्द्वेषता व महान् सुख [शान्ति]