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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/20/2

35 Sukta
4 Mantra
1/20/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
यो अ॒द्य सेन्यो॑ व॒धो ऽघा॒यूना॑मु॒दीर॑ते। यु॒वं तं मि॑त्रावरुणाव॒स्मद्या॑वयतं॒ परि॑ ॥

य: । अ॒द्य । सेन्य॑: । व॒ध: । अ॒घ॒ऽयूना॑म् । उ॒त्ऽईर॑ते । यु॒वम् । तम् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒ । अ॒स्मत् । य॒व॒य॒त॒म् । परि॑ ॥

Mantra without Swara
यो अद्य सेन्यो वधो ऽघायूनामुदीरते। युवं तं मित्रावरुणावस्मद्यावयतं परि ॥

य: । अद्य । सेन्य: । वध: । अघऽयूनाम् । उत्ऽईरते । युवम् । तम् । मित्रावरुणौ । अस्मत् । यवयतम् । परि ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार हमारा मार्ग (अदारसृत) = एकता व मेल का होगा तो कोई भी शत्रु हमपर क्यों आक्रमण कर सकेगा? इस बात को स्पष्ट करते हुए मन्त्र में कहा है-(अघायूनाम्) = दूसरों का अघ-कष्ट व अहित चाहनेवालों का (य:) = जो भी (अद्य) = आज (सेन्यः वध:) = सेना के आक्रमण के द्वारा होनेवाला वध (उदीरते) = उठ खड़ा होता है, अर्थात् यदि कोई शत्रु सेना के द्वारा आक्रमण करता है तो (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुण-परस्पर स्नेह व निर्द्वषता की भावनाओ! (युवम्) = तुम दोनों (तम्) = उस सेन्य को (अस्मत्) = हमसे (परियावयतम्) = सर्वथा पृथक्क र दो। वह शत्रु सेना के द्वारा हमारा वध न कर पाये। २. इस वध को रोकनेवाले मुख्य देव मित्र और वरुण ही हैं। पारस्परिक स्नेह व निर्द्वषता से ही हम शत्रु का मुकाबला कर सकते हैं। इसी बात को प्रथम मन्त्र में इस रूप में कहा था कि 'फूट का मार्ग न होने पर हमारा पराभव न हो'।

 
Essence
देशवासियों में परस्पर मेल व द्वेष का अभाव होने पर शत्रु उन्हें आक्रान्त नहीं कर सकता।
Subject
मित्र और वरुण द्वारा रक्षण