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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/2/4

35 Sukta
4 Mantra
1/2/4
Devata- चन्द्रमा और पर्जन्य Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- रोग उपशमन सूक्त
Mantra with Swara
यथा॒ द्यां च॑ पृथि॒वीं चा॒न्तस्तिष्ठ॑ति॒ तेज॑नम्। ए॒वा रोगं॑ चास्रा॒वं चा॒न्तस्ति॑ष्ठतु॒ मुञ्ज॒ इत् ॥

यथा॑ । द्याम् । च॒ । पृ॒थि॒वीम् । च॒ । अ॒न्तः । तिष्ठ॑ति । तेज॑नम् । ए॒व । रोग॑म् । च॒ । आ॒ऽस्रा॒वम् । च॒ । अ॒न्तः । ति॒ष्ठ॒तु॒ । मुञ्ज॑: । इत् ॥

Mantra without Swara
यथा द्यां च पृथिवीं चान्तस्तिष्ठति तेजनम्। एवा रोगं चास्रावं चान्तस्तिष्ठतु मुञ्ज इत् ॥

यथा । द्याम् । च । पृथिवीम् । च । अन्तः । तिष्ठति । तेजनम् । एव । रोगम् । च । आऽस्रावम् । च । अन्तः । तिष्ठतु । मुञ्ज: । इत् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यथा) = जैसे यह (तेजनम्) = शर [Reed] (द्यां च पृथिवीं च अन्तः) = धुलोक और पृथिवीलोक में (तिष्ठति) = स्थित है (एव) = उसी प्रकार यह (मुञ्ज:) = मुञ्ज नामक शर (रोगं च आस्त्रावं च) = रोग और पीब आदि बहनेवाले घावों के (अन्त:) = बीच में (तिष्ठतु) = ठहरे। २. तेजन शर या मुञ्ज बादल के पानी से पृथिवी पर उत्पन्न होता है। इसप्रकार यह मुञ्ज [मूंज, सरकण्डा] दोनों लोकों के बीच में स्थित है। पृथिवी से इसे विष नाशक शक्ति प्रास होती है। यह मेदिनी' इसमें Medicinal properties को उपस्थित करती है और सूर्य-किरणों के द्वारा इसमें विविध औषध-गुण स्थापित होते हैं। एवं यह शर रोगों व घावों को ठीक करनेवाला हो जाता है।
Essence
मुज का विधिवत् प्रयोग रोगों व घावों को दूर करता है।
Subject
रोग व आस्त्राव को दूर करनेवाला 'मुञ्ज'
Special
[१] सूक्त के आरम्भ में आधि-व्याधियों की शान्ति करनेवाले 'शर' के जन्म का वर्णन है। [२] यह हमें दृढ़ शरीर और निर्दोष मनवाला बनाता है। [३] हमें चाहिए कि हम गोदुग्ध व वनस्पतियों से ही शरीर का पालन करें। [४] यह निश्चय रक्खें कि इस शर [मुञ्ज] का प्रयोग हमें रोगों व घावों से बचाएगा। इस शर में 'पर्जन्य, मित्र, वरुण, चन्द्र व सूर्य' की शक्तियाँ निहित हैं।