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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/2/3

35 Sukta
4 Mantra
1/2/3
Devata- चन्द्रमा और पर्जन्य Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिपदा विराड् गायत्री Suktam- रोग उपशमन सूक्त
Mantra with Swara
वृ॒क्षं यद्गावः॑ परिषस्वजा॒ना अ॑नुस्फु॒रं श॒रमर्च॑न्त्यृ॒भुम्। शरु॑म॒स्मद्या॑वय दि॒द्युमि॑न्द्र ॥

वृ॒क्षम् । यत् । गावः॑ । प॒रि॒ऽस॒ख॒जा॒नाः । अ॒नु॒ऽस्फु॒रम् । श॒रम् । अर्च॑न्ति । ॠ॒भुम् । शरु॑म् । अ॒स्मत् । य॒व॒य॒ । दि॒द्युम् । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
वृक्षं यद्गावः परिषस्वजाना अनुस्फुरं शरमर्चन्त्यृभुम्। शरुमस्मद्यावय दिद्युमिन्द्र ॥

वृक्षम् । यत् । गावः । परिऽसखजानाः । अनुऽस्फुरम् । शरम् । अर्चन्ति । ॠभुम् । शरुम् । अस्मत् । यवय । दिद्युम् । इन्द्र ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र में शरीर को 'वृक्ष' कहा है, क्योंकि मानव-जीवन का लक्ष्य यही है कि अन्तत: इस शरीर का वृश्चन-छेदन हो। हमें फिर-फिर शरीर न लेना पड़े। (यत्) = जब (गाव:) = गौओं से दिया गया दूध (वृक्षम्) = इस शरीर-वृक्ष को (परिषस्वजाना:) = आलिङ्गन करनेवाला होता है तथा (अनुस्फुरम्) = [अनुर्लक्षणे] स्फूर्ति का लक्ष्य करके लोग (ऋभुम्) = [उरु भाति] तेजस्विता से दीप्त (शरम् अर्चन्ति) = शर का आदर करते हैं तब हे (इन्द्र) = शत्रुओं के विद्रावक प्रभो! (अस्मत) = हमसे (दिद्युम्) = एक चमकते हुए घातक अस्त्र के समान (शरुम्) = क्रोध व वासना [Anger, passion] को (यावय) = दूर कीजिए। २. दूध व शर आदि औषधियों का प्रयोग शरीर में स्फूर्ति व दीसि लाता है तथा मन से क्रोध व वासना को दूर करता है। यह क्रोध हमारे लिए ही एक घातक अस्त्र बनता है और हमारा ही विनाश करता है, अत: हमें प्रयत्न यही करना है कि हमारा भोजन दूध व वनस्पति ही रहे। हम घासपक्षवाले ही बने रहें, मांसपक्षवाले न बन जाएँ। यह मांस तो [माम् सः] मुझे ही खा जाएगा।
Essence
हम गोदुग्ध व शरादि वानस्पतिक पदार्थों से ही शरीर का पोषण करें।
Subject
गोदुग्ध व वानस्पतिक पदार्थ