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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/19/4

35 Sukta
4 Mantra
1/19/4
Devata- ईश्वरः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
यः स॒पत्नो॒ यो ऽस॑पत्नो॒ यश्च॑ द्वि॒षन्छपा॑ति नः। दे॒वास्तं सर्वे॑ धूर्वन्तु॒ ब्रह्म॒ वर्म॒ ममान्त॑रम् ॥

य: । स॒ऽपत्न॑: । य: । अस॑पत्न: । य: । च॒ । द्वि॒षन् । शपा॑ति । न॒: । दे॒वा: । तम् । सर्वे॑ । धू॒र्व॒न्तु॒ । ब्रह्म॑ । वर्म॑ । मम॑ । अन्त॑रम् ॥

Mantra without Swara
यः सपत्नो यो ऽसपत्नो यश्च द्विषन्छपाति नः। देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम् ॥

य: । सऽपत्न: । य: । असपत्न: । य: । च । द्विषन् । शपाति । न: । देवा: । तम् । सर्वे । धूर्वन्तु । ब्रह्म । वर्म । मम । अन्तरम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यः) = जो (सपत्न:) = शत्रु अथवा (यः) = जो (असपत्न:) = शत्रु नहीं भी लगता, (यः च) = और जो (द्विषन्) = हमारे साथ प्रीति न करता हुआ (नः) = हमें (शपाति) = आकृष्ट करता है [Curses], (तम्) = उसे (सर्वे देवा:) = सब देव (धूर्वन्तु) = हिंसित करें। उसे देवताओं की अनुकूलता प्राप्त न हो। सूर्य आदि देवों की प्रतिकूलता से वह अस्वस्थ होकर शान्ति-लाभ न कर पाये। वस्तुत: जो दूसरों को शाप देता है, वह शाप उसके लिए ही शाप प्रमाणित होता है। उसके अन्दर विषैले द्रव्य पैदा होकर उसे ही अस्वस्थ व अशान्त कर देते हैं। हम उसके लिए अमङ्गल की भावना को अपने हृदयों में न आने दें। उसका शाप उसे स्वयं दण्डित करनेवाला होगा। २. हम तो यह निश्चय करें कि (ब्रह्म) = यह ज्ञान अथवा प्रभु (मम) = मेरे (आन्तरं वर्म) = आन्तर कवच होंगे और मैं उन शत्रुओं और विद्वेषियों के अपशब्दरूप बाणों से विद्ध न होऊँगा। मैं क्षुब्ध न होकर सदा शान्त रहूँगा।
Essence
हम ब्रह्म को अपना कवच बनाकर '(आकुष्टः कुशलं वदेत्) निन्दा करने पर भी निन्दक के कल्याण की कामना करे-इस सिद्धान्त को अपनाने का प्रयल करें।
Subject
ब्रह्मरूप आन्तर-कवच
Special
सूक्त के आरम्भ में लोभ व काम से विद्ध न होने की प्रार्थना है [२] और इस वेधन से बचने के लिए समाप्ति पर ब्रह्म को आन्तर-कवच बनाने का विधान है [४]। ब्रह्म को कवच बनानेवाला अथर्वा' अडिग बनता है। यह शान्त होता है [सोम] और प्रार्थना करता है कि -