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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/19/3

35 Sukta
4 Mantra
1/19/3
Devata- ईश्वरः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
यो नः॒ स्वो यो अर॑णः सजा॒त उ॒त निष्ट्यो॒ यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति। रु॒द्रः श॑र॒व्य॑यै॒तान्ममा॒मित्रा॒न्वि वि॑ध्यतु ॥

य: । न॒ :। स्व: । य: । अर॑ण: । स॒ऽजा॒त: । उ॒त ‍। निष्ट्य॑: । य: । अ॒स्मान् । अभिऽदास॑ति ।रु॒द्र: । श॒र॒व्यया । ए॒तान् । मम॑ । अ॒मित्रा॑न् । वि । वि॒ध्य॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
यो नः स्वो यो अरणः सजात उत निष्ट्यो यो अस्माँ अभिदासति। रुद्रः शरव्ययैतान्ममामित्रान्वि विध्यतु ॥

य: । न :। स्व: । य: । अरण: । सऽजात: । उत ‍। निष्ट्य: । य: । अस्मान् । अभिऽदासति ।रुद्र: । शरव्यया । एतान् । मम । अमित्रान् । वि । विध्यतु ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यः) = जो (न:) = हमें (स्व:) = अपना अथवा (य:) = जो  (अरण:) = पराया (सजात:) = अपनी बिरादरी व कुटुम्ब का (उत) = और (निष्टय:) = बिरादरी से बाहर का (यः) = जो कोई (अस्मान्) = हमें (अभिदासति) = इन वासनाओं में फंसाकर नष्ट करने का प्रयत्न करता है-ये सब मेरे अमित्र [शत्र] तो है ही। इन्हें मैं अपना हितचिन्तक न समझ बै, और इनकी बातों में आकर जीवन को नष्ट न कर डालूँ। २. (रुद्रः) = शत्रुओं को रुलानेवाला वह प्रभु (एतान् मम अमित्रान्) = मेरे इन शत्रुओं को ही (शरव्या) = काम-लोभादि के बाणसमूह से (विविध्यतु) = विद्ध करे। मैं तो प्रभुकृपा से इनके प्रभाव से दूर रहूँ और इस शरसमूह से विद्ध न होऊँ। वस्तुत: प्रभु मेरे उन शत्रुओं को ही इनके घातक प्रभाव से पीड़ित कर रुलानेवाले हों और इसप्रकार कटु अनुभव प्राप्त कराके उन्हें इन बासनाओं से बचने के लिए प्रेरित करें।
Essence
भावार्थ-अपने-पराये, बिरादरी के व बाहर के सभी के कुप्रभावों से हम बचें और लोभ व काम के शिकार न हों।
Subject
कुसङ्ग के कुप्रभाव से दूर