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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/19/2

35 Sukta
4 Mantra
1/19/2
Devata- ईश्वरः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पुरस्ताद्बृहती Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
विष्व॑ञ्चो अ॒स्मच्छर॑वः पतन्तु॒ ये अ॒स्ता ये चा॒स्याः॑। दै॑वीर्मनुष्येसषवो॒ ममा॑मित्रा॒न्वि वि॑ध्यत ॥

विष्व॑ञ्च: । अ॒स्मत् । शर॑व: । प॒त॒न्तु॒ । ये । अ॒स्ता: । ये । च॒ । आ॒स्या: । दैवी॑: । म॒नु॒ष्य॒ऽइ॒ष॒व॒: । मम॑ । अ॒मित्रा॑न् । वि । वि॒ध्य॒त॒ ॥

Mantra without Swara
विष्वञ्चो अस्मच्छरवः पतन्तु ये अस्ता ये चास्याः। दैवीर्मनुष्येसषवो ममामित्रान्वि विध्यत ॥

विष्वञ्च: । अस्मत् । शरव: । पतन्तु । ये । अस्ता: । ये । च । आस्या: । दैवी: । मनुष्यऽइषव: । मम । अमित्रान् । वि । विध्यत ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के विव्याधी और अभिव्याधी के (ये अस्ता:) = जो फेंके जा चुके हैं, ये (च) = और जो (आस्या:) = फेंके जाने हैं, वे (विष्वञ्चः शरव:) = विविध दिशाओं से आनेवाले अस्त्र (अस्मत्) = हमसे दूर ही (पतन्त) = गिरें । हम इनके बाणों के शिकार न हों। जो बाण इन्होंने फेंके हैं उनके आक्रमण से हम बचें और जो बाण इनसे फेंके जाएँगे उनसे भी हम बच पाएँ। वर्तमान में भी लोभ

और काम के शिकार न हों, भविष्य में भी इनका शिकार होने की आशंका से बचे रहें। २. हे (देवी:) = देव-सम्बन्धी अस्त्रो! तथा (मनुष्येषवः) = मनुष्य-सम्बन्धी अस्त्रो! तुम सब (मम) = मेरे (अमित्रान्) = शत्रुओं को ही (विविध्यत) = बींधो, मैं तुम्हारा शिकार न होऊँ। देव-सम्बन्धी अस्त्र 'निखरते हुए यौवन का सौन्दर्य, चाल की मस्ती व कटाक्षवीक्षण [Side look glance] आदि हैं। हम इन सबके कुप्रभाव से बचें। हमारे शत्रु ही इनके शिकार बनें।
Essence
हम वर्तमान में भी लोभ व काम के शिकार न हों, भविष्य में भी इनका शिकार होने से बचें। प्रकृति की बसन्त-ऋतु आदि में होनेवाली शोभा तथा किसी भी युवक व युवति की हाव-भावभरी गतियाँ हमें काम का शिकार न बना सकें।
Subject
"दैव व मानुष' इषु