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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/17/3

35 Sukta
4 Mantra
1/17/3
Devata- हिरा Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- रुधिरस्रावनिवर्तनधमनीबन्धन सूक्त
Mantra with Swara
श॒तस्य॑ ध॒मनी॑नां स॒हस्र॑स्य हि॒राणा॑म्। अस्थु॒रिन्म॑ध्य॒मा इ॒माः सा॒कमन्ता॑ अरंसत ॥

श॒तस्य॑ । ध॒मनी॑नाम् । स॒हस्र॑स्य । हि॒राणा॑म् । अस्थु॑: । इत् । म॒ध्य॒मा: । इ॒मा: । सा॒कम् । अन्ता॑: । अ॒रं॒स॒त॒ ॥

Mantra without Swara
शतस्य धमनीनां सहस्रस्य हिराणाम्। अस्थुरिन्मध्यमा इमाः साकमन्ता अरंसत ॥

शतस्य । धमनीनाम् । सहस्रस्य । हिराणाम् । अस्थु: । इत् । मध्यमा: । इमा: । साकम् । अन्ता: । अरंसत ॥

Meaning
१. नाडीचक्र में एक और धमनियों हैं, दूसरी और हिराएँ हैं। धमनियों रुधिर को शरीर में भेज रही हैं और हिराएँ उसे पुन: हृदय में लौटा रही हैं। इनके बीच की नाड़ियों को रोकर कई बार इनके अन्तिम प्रदेशों [दोनों सिरों] को ठीक करना होता है। उसी का वर्णन करते हैं-(धमनीनां शतस्य) = सौं धमनियों के तथा हिराणां (सहस्त्रस्य) = हजारों हिराओं के (मध्यमाः इमा:) = बीच में होनेवाली नाड़ियाँ (इत:) = निश्चय से (अस्थुः) = रुक गई हैं। अब (अन्ता:) = इनके अन्तभाग (साकम) = साथ-साथ ही (अरंसत) = रुक गये हैं [रम्-to Pause] २. नाड़ीचक्र में धमनियों व हिराओं के बीच में होनेवाली योजक नाड़ियों का ठीक होना नितान्त आवश्यक है। इनके अन्तिम भाग भी ठीक होने आवश्यक हैं।
Essence
धमनियों और हिराओं के बीच की नाड़ियों के कार्य का ठीक होना नितान्त आवश्यक है।
Subject
धमनियों और हिराओं के बीच की नाड़ियाँ

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