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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/16/4

35 Sukta
4 Mantra
1/16/4
Devata- मन्त्रोक्ता Rishi- चातनः Chhanda- ककुम्मत्यनुष्टुप् Suktam- शत्रुबाधन सूक्त
Mantra with Swara
यदि॑ नो॒ गां हंसि॒ यद्यश्वं॒ यदि॒ पूरु॑षम्। तं त्वा॒ सीसे॑न विध्यामो॒ यथा॒ नो ऽसो॒ अवी॑रहा ॥

यदि॑ । न॒: । गाम् । हंसि॑ । यदि॑ । अश्व॑म् । यदि॑ । पुरु॑षम् ‌। तम् । त्वा॒ । सीसे॑न । वि॒ध्या॒म॒: । यथा॑ । न॒: । अस॑: । अवी॑रऽहा ॥

Mantra without Swara
यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्। तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो ऽसो अवीरहा ॥

यदि । न: । गाम् । हंसि । यदि । अश्वम् । यदि । पुरुषम् ‌। तम् । त्वा । सीसेन । विध्याम: । यथा । न: । अस: । अवीरऽहा ॥

Meaning
१. गतमन्त्र में यह स्पष्ट है कि जिस भी व्यक्ति को आवश्यकता समझकर बन्दूक का लाइसेंस मिला है, उसे उस बन्दूक से चोर आदि के उपद्रव को दूर करने का प्रयत्न करना है, परन्तु यदि अपने पद व धन आदि से गर्व में चूर होकर वह उस बन्दूक का दुरुपयोग करता है, तो वही उस बन्दूक से दण्डनीय हो जाता है, अतः मन्त्र में कहा है-(यदि) = यदि तू (न:) = हमारी (गां हंसि) = गौ को मार देता है, यदि (अश्वम्) = यदि घोड़े को मार देता है, यदि (पूरुषम्) यदि किसी निर्दोष पुरुष को ही मार देता है तो (तं त्वा) = उस तुझे ही (सीसेन विध्यामः) = सीसे की गोली से मारते हैं यथा-जिससे (तून:) = हमारे (अवीरहा असः) = वीरों को मारनेवाला न हो। २. यदि किसी ग्वाले की गौ इसके उद्यान को कुछ खराब कर देती है, या किसी कोचवान या कुम्हार का घोड़ा इसकी फुलवाड़ी को कुछ नष्ट कर देता है और वह क्रोध में आकर इन्हें मारता है तो वह दण्डनीय हो जाता है। यह भी हो सकता है कि क्रोध में आकर वह उस ग्वाले व ताँगेवाले को ही मार दे। ऐसी स्थिति में उस बन्दूक से इसे ही दण्डित करना आवश्यक हो जाता है।
Essence
लाइसेंस [रक्षण स्वीकृति] प्रास बन्दूक से निर्दोष गौ, घोड़े व मनुष्यों को नहीं मारना चाहिए।
Subject
बन्दूक का दुरुपयोग
Special
सुक्त के आरम्भ में कहा है कि ज्ञानी संन्यासी चोर इत्यादि को सदपदेश से अच्छा बनाने का प्रयत्न करे [१]। विवशता में चोर आदि को गोली से उड़ा दे [२]। यह गोली डाकु, चोर व पिशाचों के नाश के लिए उद्दिष्ट है [३] परन्तु यदि कोई इससे गौ, घोड़े या मनुष्य को मारे तो वह स्वयं इस गोली से दण्डनीय हो [४]। गोली के अनिष्ट प्रयोग से हो जानेवाले रक्तस्त्राव को कैसे बन्द किया जाए, इसका वर्णन अगले मन्त्र में हैं -

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