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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/16/2

35 Sukta
4 Mantra
1/16/2
Devata- इन्द्रः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुबाधन सूक्त
Mantra with Swara
सीसा॒याध्या॑ह॒ वरु॑णः॒ सीसा॑या॒ग्निरुपा॑वति। सीसं॑ म॒ इन्द्रः॒ प्राय॑च्छ॒त्तद॒ङ्ग या॑तु॒चात॑नम् ॥

सीसा॑य । अधि॑ । आ॒ह॒ । वरु॑ण: । सीसा॑य । अ॒ग्नि: । उप॑ । अ॒व॒ति॒ । सीस॑म् । मे॒ । इन्द्र॑: । प्र । अ॒य॒च्छ॒त् । तत् । अ॒ङ्ग । या॒तु॒ऽचात॑नम् ॥

Mantra without Swara
सीसायाध्याह वरुणः सीसायाग्निरुपावति। सीसं म इन्द्रः प्रायच्छत्तदङ्ग यातुचातनम् ॥

सीसाय । अधि । आह । वरुण: । सीसाय । अग्नि: । उप । अवति । सीसम् । मे । इन्द्र: । प्र । अयच्छत् । तत् । अङ्ग । यातुऽचातनम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार 'तुरीय अग्नि' ज्ञानोपदेश के द्वारा चोरों को परिवर्तित करने का प्रयत्न करता है। उसी समय इन्द्र, अर्थात् राजा भी दण्ड-भयादि के द्वारा उन्हें ठीक मार्ग पर लाने के लिए प्रयत्नशील होता है और वरुण न्यायाधीश राष्ट्र में दुष्टों को उचित दण्ड देता हुआ चोरों को समाप्त करता है, परन्तु जब ये प्रयत्न विफल हो जाते हैं तब (वरुण:) = बुराइयों का निवारण करनेवाला न्यायाधीश (सीसाय) = सीसे की गोली के लिए (अध्याह) = कहता है, अर्थात् यही विधान करता है कि इन्हें गोली से उड़ा दो। (अनि:) = उपदेष्टा ब्राह्मण भी (सीसाय)  सीसे की गोली के लिए ही (उपावति) = [अव-कान्ति, इच्छा] इच्छा करता है। २. ऐसी स्थिति में औरों से रक्षा के लिए (इन्द्रः) = राजा मे मेरे लिए (सीसम्) = इन सीसे की गोलियों को (प्रायच्छत) = देता है और कहता है कि हे (अङ्ग) = प्रिय प्रजाजन! (तत्) = यह गोली ही (यातुचातनम्) = दैत्यों को, चोर आदि को नष्ट करनेवाली है, अर्थात् आवश्यक होने पर राजा की ओर से बन्दूक आदि का लाइसेंस मिल जाता है और उसके द्वारा इन यातुओं का नाश करना अभीष्ट होता है।
Essence
न्यायाधीश, ब्राह्मण व राजा सभी न सुधरनेवाले चोरों को गोली मार देने का आदेश देते हैं।
Subject
सीसे की गोली