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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/15/4

35 Sukta
4 Mantra
1/15/4
Devata- सिन्धुसमूहः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पुष्टिकर्म सूक्त
Mantra with Swara
ये स॒र्पिषः॑ सं॒स्रव॑न्ति क्षी॒रस्य॑ चोद॒कस्य॑ च। तेभि॑र्मे॒ सर्वैः॑ संस्रा॒वैर्धनं॒ सं स्रा॑वयामसि ॥

ये । स॒र्पिष॑: । स॒म्ऽस्रव॑न्ति । क्षी॒रस्य॑ । च॒ । उ॒द॒कस्य॑ । च॒ । तेर्भि॑: । मे॒ । सर्वै॑: । स॒म्ऽस्रा॒वै: । धन॑म् । सम् । स्रा॒व॒या॒म॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च। तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि ॥

ये । सर्पिष: । सम्ऽस्रवन्ति । क्षीरस्य । च । उदकस्य । च । तेर्भि: । मे । सर्वै: । सम्ऽस्रावै: । धनम् । सम् । स्रावयामसि ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ये) = जो (सर्पिषः संस्त्रवन्ति) = घृत के प्रवाह मिलकर चलते हैं। एक-एक बूंद ने क्या बहना? इसीप्रकार (क्षीरस्य च) = जो दूध के प्रवाह बहते हैं और (उदकस्य च) = पानी के प्रवाह भी बहते हैं, इनमें भी एक-एक बूंद को तो नष्ट ही हो जाना था। इसप्रकार (मे) = मेरे (तेभिः सर्वैः संस्त्रावैः) = उन सब मिलकर बहनेवाले प्रवाहों से (धनम्) = धन को (संस्त्रावयामसि) = संस्तुत करते हैं। २. एक घर को 'घृत, दुग्ध व जल' के प्रवाह ही धन्य बनाते हैं। घर वही उत्तम है, जहाँ इन वस्तुओं की कमी न हो। इनकी कमी न होने पर मनुष्य सबल, स्वस्थ व सुन्दर शरीरवाला बनकर धनार्जन के योग्य बनता है। २. यहाँ प्रसङ्गवश यह सङ्केत भी ध्यान देने योग्य है कि जहाँ सङ्गठन व मेल होता है वहाँ घृत व दूध आदि की नदियाँ बहती हैं, वहाँ निर्धनता के कारण इन वस्तुओं का अभाव नहीं होता।
Essence
मेल में ही स्वर्ग है, घी-दूध की नदियों का प्रवाह मेल में ही है।
Subject
घी, दूध की नदियों
Special
इस सूक्त में नदियों, वायुओं व पक्षिगणों के उदाहरण से मेल के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है [१]। सङ्गठन-यज्ञों में हम पशुभाव को नष्ट करने का प्रयत्न करें [२]। सङ्गठन में ही धन है [३], वहीं घी, दूध की नदियों का प्रवाह है [४]। ऐसे सङ्गठनवाले समाज में चोर नहीं होते। यह समाज चोरों का नाश करनेवाला होता है, अत: 'चातन' [चातयति नाशयति] कहलाता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।