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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/15/3

35 Sukta
4 Mantra
1/15/3
Devata- सिन्धुसमूहः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पुष्टिकर्म सूक्त
Mantra with Swara
ये न॒दीनां॑ सं॒स्रव॒न्त्युत्सा॑सः॒ सद॒मक्षि॑ताः। तेभि॑र्मे॒ सर्वैः॑ संस्रा॒वैर्धनं॒ सं स्रा॑वयामसि ॥

ये । न॒दीना॑म् । स॒म्ऽस्रव॑न्ति । उत्सा॑स : । सद॑म् । अक्षि॑ता: ।तेर्भि॑: । मे॒ । सर्वै॑: । स॒म्ऽस्रा॒वै: । धन॑म् । सम् । स्रा॒व॒या॒म॒सि॒॥

Mantra without Swara
ये नदीनां संस्रवन्त्युत्सासः सदमक्षिताः। तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि ॥

ये । नदीनाम् । सम्ऽस्रवन्ति । उत्सास : । सदम् । अक्षिता: ।तेर्भि: । मे । सर्वै: । सम्ऽस्रावै: । धनम् । सम् । स्रावयामसि॥

Meaning
१. (ये) = जो (नदीनाम्) = नदियों के (उत्सास:) = प्रवाह (अक्षिता:) = सङ्गठन के कारण अक्षीण हुए हुए (सदम् संस्त्रवन्ति) = सदा बहते हैं, प्रभु कहते हैं कि मे मेरे (तेभिः सर्वैः संस्त्रावै:) = उन सब सम्मिलित प्रवाहों से (धनं सं स्त्रावयामसि) = धन को प्राप्त कराते हैं। २. सदा बहनेवाली नदियाँ [क] नावों के लिए उपयुक्त मार्ग बनकर व्यापारिक सुविधा उपस्थित करती हैं, इस व्यापार के द्वारा धनवृद्धि होती है, [ख] इनके जलों को बाँध आदि से रोककर विद्युत् उत्पन्न करने की व्यवस्था होती है। वह विविध यन्त्रों के चालन द्वारा धनवृद्धि का कारण होती है, [ग] सदा प्रवाहित होनेवाली नदियाँ नहरों के द्वारा सिंचाई के लिए भी सहायक होती हैं। ३. ये नदियों के प्रवाह अलग-अलग बहते रहें तो न नावें चलतीं, न विद्युत् उत्पन्न होती और न इससे नहरें निकल पातीं।
Essence
सम्मिलित रूप में बहनेवाली नदियों के प्रवाह नावों के मार्ग बनकर विद्यदुत्पादन में सहायक होकर तथा नहरों द्वारा सिंचाई का साधन बनकर धनवृद्धि का कारण होती है।
Subject
सङ्गठन व धन

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