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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/15/2

35 Sukta
4 Mantra
1/15/2
Devata- सिन्धुसमूहः Rishi- अथर्वा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- पुष्टिकर्म सूक्त
Mantra with Swara
इ॒हैव हव॒मा या॑त म इ॒ह सं॑स्रावणा उ॒तेमं व॑र्धयता गिरः। इ॒हैतु॒ सर्वो॒ यः प॒शुर॒स्मिन्ति॑ष्ठतु॒ या र॒यिः ॥

इ॒ह । ए॒व । हव॑म् । आ । या॒त॒ । मे॒ । इ॒ह । स॒मऽस्रा॒व॒णा॒: । उ॒त । इ॒म् । व॒र्ध॒य॒त॒ । गि॒र॒: ।इ॒ह । आ । ए॒तु॒ । सर्व॑: । य: । प॒शु: । अ॒स्मिन् । ति॒ष्ठ॒तु॒ । या । र॒यि: ॥

Mantra without Swara
इहैव हवमा यात म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः। इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन्तिष्ठतु या रयिः ॥

इह । एव । हवम् । आ । यात । मे । इह । समऽस्रावणा: । उत । इम् । वर्धयत । गिर: ।इह । आ । एतु । सर्व: । य: । पशु: । अस्मिन् । तिष्ठतु । या । रयि: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. सङ्गठन का प्रधान कहता है कि (इह) = यहाँ (मे हवम्) = मेरी पुकार होने पर (आयात एव) = आओ ही, (उत) = और यहाँ सभास्थल में आकर हे (संस्त्रावणा: गिरः) = सङ्गठन करनेवाले प्रचारको! (इमम् वर्धयत) = इस सङ्गठन को बढ़ाओ, अर्थात् सङ्गठन के महत्त्व को लोगों के हदयों पर अङ्कित करके उनमें सङ्गठन की भावना भर दो। २. तुम्हारी इन वाणियों के परिणामस्वरूप (यः पशु:) = जो पाशविक भावना है, स्वार्थ के कारण अलग-अलग रहने की भावना है, वह (सर्व:) = सभी (इह एतु) = यहाँ सभास्थल पर आये और वह यहीं रह जाए, वह यहीं यज्ञाग्नि में भस्म हो जाए और (अस्मिन्) = इन उपस्थित लोगों में (यः रयि:) = जो धन है, धन्य बनानेवाली उत्तम भावना है, वही (तिष्ठतु) = रहे।
Essence
लोग सङ्गठन-यज्ञ के लिए होनेवाली सभाओं में एकत्र हों। वहाँ प्रमुख वक्ताओं के भाषणों से प्रभावित होकर पशुभाव को दूर करें और एकता के भाव से अपने को धन्य बनाएँ।
Subject
पशुभाव का नाश