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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/14/3

35 Sukta
4 Mantra
1/14/3
Devata- वरुणो अथवा यमः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- चतुष्पाद्विराडनुष्टुप् Suktam- कुलपाकन्या सूक्त
Mantra with Swara
ए॒षा ते॑ कुल॒पा रा॑ज॒न्तामु॑ ते॒ परि॑ दद्मसि। ज्योक्पि॒तृष्वा॑साता॒ आ शी॒र्ष्णः स॒मोप्या॑त् ॥

ए॒षा । ते॒ । कु॒ल॒ऽपा: । रा॒ज॒न् । ताम् । ऊं॒ इति॑ । ते॒ । परि॑ । द॒द्म॒सि॒ । ज्योक् । पि॒तृषु॑ । आ॒सा॒तै॒ । आ । शी॒र्ष्ण: । सॅं॒म्ऽओप्या॑त् ॥

Mantra without Swara
एषा ते कुलपा राजन्तामु ते परि दद्मसि। ज्योक्पितृष्वासाता आ शीर्ष्णः समोप्यात् ॥

एषा । ते । कुलऽपा: । राजन् । ताम् । ऊं इति । ते । परि । दद्मसि । ज्योक् । पितृषु । आसातै । आ । शीर्ष्ण: । सॅंम्ऽओप्यात् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१ . हे (राजन्) = नियमित जीनेवाली युवक ! (एष) = यह वधू (ते) = तेरे (कुलपा) = कुल का लक्षण करनेवाली हो , मुझसे संतान को जन्म देकर तेरे कुल का विच्छेद न होने देनेवाली हो | (ताम्) = उसे हम (उ) = निश्चय से (ते) = तेरे लिए (परि दाद्यसी) =  देते हैं | २. यह कन्या वह है जोकि (आ शीर्ष्णा: स्मोप्यात्) = [सम् आ वप्] सिर में, मस्तिष्क में ज्ञान केसम्यक् वपन के समय तक (ज्योक्) = देर तक (पितृषु आसाता) = माता-पिता व आचार्य के समीप रही है| 'पितृषु' यह बहुवच

शब्द आचार्य-सान्निध्य का भी संगेत कर रहा है | ज्ञान देने से आचार्य भी पिता ही है |
Essence
विवाह का प्रमुख उद्देश्य वंश का उच्छेदन न होने देना ही है, अतः गृहस्थ एक अत्यंत पवित्र आश्रम है | मस्तिष्क को ज्ञान से अलंकृत करने के पश्चात् ही एक युवति इसमें प्रवेश करती है|
Subject
विवाह का उद्देश्य