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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/14/2

35 Sukta
4 Mantra
1/14/2
Devata- वरुणो अथवा यमः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कुलपाकन्या सूक्त
Mantra with Swara
ए॒षा ते॑ राजन्क॒न्या॑ व॒धूर्नि धू॑यतां यम। सा मा॒तुर्ब॑ध्यतां गृ॒हे ऽथो॒ भ्रातु॒रथो॑ पि॒तुः ॥

ए॒षा । ते॒ । रा॒ज॒न् । क॒न्या । व॒धू: । नि । धू॒य॒ता॒म् । य॒म॒ ।सा । मा॒तु: । व॒ध्य॒ता॒म् । गृ॒हे । अथो॒ इति॑ । भ्रातु॑: । अथो॒ इति॑ । पि॒तु: ‌॥

Mantra without Swara
एषा ते राजन्कन्या वधूर्नि धूयतां यम। सा मातुर्बध्यतां गृहे ऽथो भ्रातुरथो पितुः ॥

एषा । ते । राजन् । कन्या । वधू: । नि । धूयताम् । यम ।सा । मातु: । वध्यताम् । गृहे । अथो इति । भ्रातु: । अथो इति । पितु: ‌॥

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1 Bhashyas
Meaning
१ युवक के प्रस्ताव करने पर कन्या के माता - पिता सब विचार करते हैं और विचार का पश्चात् प्रस्ताव की स्वीकृति देते हुए कहते हैं कि है (राजन्) = भोतिक क्रियाओं [खान-पान, सोना-जागना] आदि में अत्यंत नियमित जीनेवाले, समय पर इन सब कार्यों को करनेवाले (यम) = संयमी जीनेवाले युवक ! (एषा कन्या) = यह  अपने गुणों व तेज से चमकनेवाली (वधु:) = सब कार्यभार का वाहन करनेवाली हमारी सन्तान (ते) = तेरे लिए (निधूयताम्) = हमारे घर से तेरे घर में भेज दी जाए (Remove) |  युवक की द्रष्टव्य विशेषताएं 'राजन् व यम' शब्दों से स्पष्ट हैं | वह युवक भोजन अदि की क्रियांओं में बड़ा नियमित हो और संयमी जीनेवाला हो | युवती भी तेज से चमके ; रुधिर अभाव से पिंगला-सी न हो तथा गृहकार्य वाहन करनेवाली हो| २. (सा) = वह कन्या विवाहित होने के पश्चात् (मातु: गृहे बध्यताम्) = माथा के घर में सम्बंधवाली हो , अर्थात जब वह पतिगृह  से कहीं अन्यत्र जाए तो नाना के घर में जाए (अथो) = और (भ्रातु:) = अपने भाई के घर में जाए (अथो) = और (पितुः) = अपने पिताजी के घर में जाए | अन्य सम्बंधियो के घरों में जाने से व्यर्थ के कलह उठ खड़े होते हैं | इधर-उधर कम जाने से सम्बन्ध मधुर बने रहते हैं | एवम् कन्या की शोभा इसी में है कि वह  नाना दादा [पिता] व भाई घर में ही अधिकतर जानेवाली हो|
Essence
युवक नियमित जीनेवाला व संयम हो | युवति तेजोदीप्त व गृहकार्य वहन करने सक्षम हो |
Subject
वर के मुख्य गुण 'नियमितता, संयम'