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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/13/4

35 Sukta
4 Mantra
1/13/4
Devata- विद्युत् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् पराबृहतीगर्भा पङ्क्तिः Suktam- विद्युत सूक्त
Mantra with Swara
यां त्वा॑ दे॒वा असृ॑जन्त॒ विश्व॒ इषुं॑ कृण्वा॒ना अस॑नाय धृ॒ष्णुम्। सा नो॑ मृड वि॒दथे॑ गृणा॒ना तस्यै॑ ते॒ नमो॑ अस्तु देवि ॥

याम् । त्वा॒ । दे॒वा: । असृ॑जन्त । विश्वे॑ । इषु॑म् । कृ॒ण्वा॒ना: । अस॑नाय । धृ॒ष्णुम् ।सा । न॒: । मृ॒ड॒ । वि॒दधे॑ । गृ॒णा॒ना । तस्यै॑ । ते॒ । नम॑: । अ॒स्तु॒ । दे॒वि॒ ॥

Mantra without Swara
यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषुं कृण्वाना असनाय धृष्णुम्। सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि ॥

याम् । त्वा । देवा: । असृजन्त । विश्वे । इषुम् । कृण्वाना: । असनाय । धृष्णुम् ।सा । न: । मृड । विदधे । गृणाना । तस्यै । ते । नम: । अस्तु । देवि ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (देवि) = प्रभु की दिव्यशक्ते! (तस्यै ते नमः अस्तु) = उस तेरे लिए नमस्कार हो, (याम्) = जिस तुझे (विश्वेदेवा:) = सब देव (धृष्णम्) = धर्षक शत्रु को-काम-क्रोध आदि पराभूत करनेवाले शत्रुओं को (असनाय) = परे फेंकने के लिए (इधुं कृण्वाणा:) = बाण के रूप में करते हुए (असृजन्त) = उत्पन्न करते हैं। मनुष्य के लिए काम-क्रोध आदि को जीतना सम्भव नहीं। उस समय देववृत्ति के लोग परमेश्वर की दैवी शक्ति को अपना इषु [बाण] बनाते हैं। इस इषु से काम का पराजय होता है। प्रभु-स्मरण काम का विध्वंस करता है। २. (सा) = वह ईश्वरीय शक्ति (विदथे गृणाना) = ज्ञानयज्ञों में स्तुति की जाती हुई (न: मृद्ध) = हमारे लिए सुख करनेवाली हो। 'विदथ' शब्द युद्ध के लिए भी प्रयुक्त होता है। यह शक्ति काम आदि के साथ युद्ध के प्रसंग में हमारा कल्याण करनेवाली हो।
Essence
प्रभु की दिव्य शक्ति कामादि के साथ युद्ध में हमारा इषु बनती है और काम का विध्वंस करती है।
Subject
दिव्य इषु
Special
प्रभु की शक्ति ही सर्वत्र कार्य करती है [१]। तप उस शक्ति को प्राप्त करने का साधन है [२]। तप और प्रभु-प्रेरणा को सुनना ही प्रभु-दर्शन के मार्ग हैं [३]। प्रभु की दिव्य शक्ति इषु बनकर हमारे लिए काम का विध्वंस करती है [४]। इन तपस्वी कुलों में ही कुलवधुओं का जन्म होता है -